भूकंप सुरक्षा को मजबूत बनाने की थी बड़ी पहल

भारत के भूकंप जोन बदलाव पर क्यों उठा देशभर में विवाद


भूकंप सुरक्षा को मजबूत बनाने की थी बड़ी पहल

भारत दुनिया के सबसे अधिक भूकंप-संवेदनशील देशों में से एक है। हिमालयी क्षेत्र, उत्तर-पूर्व भारत, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और गुजरात का कच्छ क्षेत्र उच्च भूकंपीय जोखिम वाले इलाकों में शामिल हैं। इसी जोखिम को देखते हुए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने भूकंप-रोधी भवन निर्माण मानकों को अपडेट करने और नए भूकंप जोन (Earthquake Zonation) का प्रस्ताव तैयार किया था। इसका उद्देश्य भविष्य में जान-माल के नुकसान को कम करना और भवनों को अधिक सुरक्षित बनाना था।

हालांकि, इस प्रस्ताव का विभिन्न सरकारी एजेंसियों, राज्यों और निर्माण उद्योग ने विरोध किया, जिसके बाद केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 में इस संबंध में जारी अधिसूचना को वापस ले लिया।

भारत में वर्तमान भूकंप जोन कैसे निर्धारित किए जाते हैं?

भारत में भूकंप जोखिम का वर्गीकरण IS 1893 (Criteria for Earthquake Resistant Design of Structures) के आधार पर किया जाता है। वर्तमान व्यवस्था में देश को चार भूकंपीय क्षेत्रों में बांटा गया है:

  • जोन-II : कम जोखिम
  • जोन-III : मध्यम जोखिम
  • जोन-IV : उच्च जोखिम
  • जोन-V : अत्यधिक जोखिम

यह वर्गीकरण राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD), भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण भारत (GSI), ISRO तथा अन्य वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा उपलब्ध कराए गए भूवैज्ञानिक और भूकंपीय आंकड़ों पर आधारित है।

सबसे अधिक खतरे वाले क्षेत्र कौन–कौन से हैं?

वर्तमान जोन-V में मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के कई भाग
  • हिमाचल प्रदेश
  • उत्तराखंड
  • संपूर्ण उत्तर-पूर्व भारत
  • अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह
  • गुजरात का कच्छ क्षेत्र

इन क्षेत्रों में बड़े और विनाशकारी भूकंप आने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक मानी जाती है।

नए प्रस्ताव में क्या बदलाव किए गए थे?

BIS द्वारा तैयार संशोधित मसौदे में पहली बार Zone-6 जोड़ने का प्रस्ताव रखा गया था।

प्रस्तावित बदलावों के अनुसार:

  • हिमालयी क्षेत्र के बड़े हिस्से को नए Zone-6 में रखा जाना था।
  • अंडमान-निकोबार और कच्छ के अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों को भी इसी श्रेणी में शामिल किया जाना था।
  • जो शहर या गांव दो अलग-अलग जोन की सीमा पर स्थित हों, उन्हें स्वतः अधिक जोखिम वाले जोन में माना जाना था।
  • इससे उन क्षेत्रों में अधिक कड़े भूकंप-रोधी भवन मानकों को लागू करना पड़ता।

इसका उद्देश्य वास्तविक भूकंपीय जोखिम के अनुसार भवन निर्माण नियम तय करना था, न कि केवल प्रशासनिक सीमाओं के आधार पर।

विशेषज्ञ इस बदलाव के पक्ष में क्यों थे?

आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों का मानना था कि भारत में तेजी से शहरीकरण हो रहा है और लाखों लोग भूकंप-संवेदनशील क्षेत्रों में रह रहे हैं। ऐसे में भवनों, पुलों, अस्पतालों, मेट्रो परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को अधिक सुरक्षित बनाना आवश्यक है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह संशोधन भारत को जापान, न्यूजीलैंड और अमेरिका जैसे देशों के आधुनिक भूकंप सुरक्षा मानकों के करीब ले जा सकता था।

विरोध क्यों हुआ?

नए जोन मानचित्र का सबसे बड़ा असर निर्माण क्षेत्र पर पड़ता।

यदि किसी क्षेत्र को उच्च जोखिम वाले जोन में रखा जाता, तो:

  • भवनों की डिजाइन बदलनी पड़ती।
  • मजबूत नींव और अतिरिक्त स्टील-कंक्रीट का उपयोग करना पड़ता।
  • चल रही परियोजनाओं का पुनः डिजाइन करना पड़ता।
  • निर्माण लागत में उल्लेखनीय वृद्धि होती।
  • परियोजनाओं के पूरा होने में देरी होती।

कई सरकारी विभागों, राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी रियल एस्टेट कंपनियों ने आशंका जताई कि इससे हजारों करोड़ रुपये की अतिरिक्त लागत आएगी।

क्या सचमुच 61% भूमि और 75% आबादी प्रभावित होती?

प्रस्तावित मानचित्र के संबंध में विभिन्न विशेषज्ञ चर्चाओं में यह अनुमान सामने आया कि—

  • लगभग 61% भारतीय भूभाग मध्यम से उच्च भूकंपीय जोखिम क्षेत्र में आ सकता था।
  • लगभग 75% आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती जहां अधिक सख्त भवन मानकों का पालन करना पड़ता।

हालांकि ये आंकड़े आधिकारिक अधिसूचना का हिस्सा नहीं थे, बल्कि प्रस्तावित जोखिम विश्लेषण से जुड़े आकलनों के रूप में चर्चा में आए। सरकार ने इन आंकड़ों की अलग से आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

सरकार ने अधिसूचना वापस क्यों ली?

मार्च 2026 में सरकार ने प्रस्तावित अधिसूचना वापस लेने का निर्णय लिया।

रिपोर्टों के अनुसार विरोध के प्रमुख कारण थे:

  • निर्माण लागत में भारी वृद्धि
  • चल रही परियोजनाओं पर प्रभाव
  • मेट्रो, राजमार्ग, बांध और अन्य बुनियादी परियोजनाओं में देरी
  • रियल एस्टेट क्षेत्र पर आर्थिक दबाव
  • राज्यों और स्थानीय निकायों की आपत्तियां

कुछ उद्योग संगठनों ने आशंका जताई कि इससे निर्माण क्षेत्र की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित हो सकती है।

भारत में भूकंप का वास्तविक खतरा कितना बड़ा है?

भारत का लगभग 59% भूभाग विभिन्न स्तर के भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों में आता है। यह जानकारी NDMA और भूकंपरोधी भवन निर्माण दिशा–निर्देशों में भी दी गई है।

भारत में बड़े भूकंपों के उदाहरण:

  • 2001 गुजरात (भुज) भूकंप – तीव्रता 7.7, लगभग 13,800 से अधिक लोगों की मृत्यु, 1.6 लाख से अधिक लोग घायल तथा लाखों मकान क्षतिग्रस्त।
  • 2005 कश्मीर भूकंप – भारत और पाकिस्तान में भारी तबाही।
  • 2011 सिक्किम भूकंप – पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में व्यापक नुकसान।
  • 2015 नेपाल भूकंप – भारत के कई राज्यों में भी प्रभाव महसूस किया गया।

हिमालयी क्षेत्र आज भी भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के लगातार टकराने के कारण सक्रिय बना हुआ है।

क्या केवल भवन निर्माण नियम ही पर्याप्त हैं?

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल भवन कोड बनाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक चुनौती उनका पालन सुनिश्चित करना है।

भारत में अनेक छोटे आवासीय भवन बिना इंजीनियरिंग डिजाइन के बनाए जाते हैं। कई बार स्थानीय निकाय भवन मानकों का सख्ती से पालन नहीं करा पाते। यदि भूकंप के समय भवन मानकों का पालन न किया गया हो, तो मध्यम तीव्रता का भूकंप भी बड़ी आपदा बन सकता है।

आगे की राह क्या हो सकती है?

विशेषज्ञ निम्न सुझाव देते हैं:

  • नवीनतम वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर भूकंप जोन का समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन।
  • भवन निर्माण नियमों का कड़ाई से पालन।
  • पुराने भवनों का Seismic Retrofitting।
  • अस्पताल, स्कूल, पुल और सरकारी भवनों की संरचनात्मक जांच।
  • स्थानीय इंजीनियरों और बिल्डरों को नियमित प्रशिक्षण।
  • नागरिकों में भूकंप सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
  • आपदा तैयारी (Preparedness) और त्वरित राहत प्रणाली को मजबूत करना।

सूचनिका 365 इनसाइट्स

भारत तेजी से शहरीकरण और आधारभूत ढांचे के विस्तार के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में भूकंप सुरक्षा और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है। प्रस्तावित नए भूकंप जोन मानकों का उद्देश्य भवनों को अधिक सुरक्षित बनाना था, लेकिन बढ़ती लागत और परियोजनाओं पर प्रभाव को देखते हुए सरकार ने फिलहाल इसे वापस ले लिया। विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में वैज्ञानिक तथ्यों, आर्थिक व्यवहार्यता और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलित समाधान खोजने की आवश्यकता होगी ताकि संभावित भूकंपों से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

प्रमुख तथ्य (Quick Facts)

  • वर्तमान भूकंप जोन: Zone II, III, IV और V
  • सबसे अधिक जोखिम: हिमालय, उत्तर–पूर्व, कच्छ और अंडमान–निकोबार
  • भारत का लगभग 59% भूभाग विभिन्न स्तर के भूकंपीय जोखिम में
  • 2001 भुज भूकंप की तीव्रता: 7.7
  • भुज भूकंप में मृत्यु: 13,800+
  • भूकंपरोधी भवन मानक: IS 1893 (BIS)

आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोत

  1. National Disaster Management Authority (NDMA)
  2. Bureau of Indian Standards (BIS)
  3. Indian Meteorological Department (IMD)
  4. Geological Survey of India (GSI)
  5. Ministry of Housing and Urban Affairs (MoHUA)
  6. National Centre for Seismology (NCS)
  7. United States Geological Survey (USGS) – Earthquake Hazards Program

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