MSME क्षेत्र को क्वालिटी कंट्रोल में दी गई राहत
MSME को राहत देने वाला क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत में “मेक इन इंडिया”, “आत्मनिर्भर भारत” और वैश्विक विनिर्माण (Manufacturing Hub) बनने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार लगातार उद्योगों की गुणवत्ता सुधारने पर काम कर रही है। इसी दिशा में क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (Quality Control Order – QCO) सबसे महत्वपूर्ण नीतियों में से एक बनकर उभरा है। हाल ही में केंद्र सरकार ने MSME उद्योगों की समस्याओं को देखते हुए Transition Facilitation (Quality Control) Order, 2026 लागू किया है, जिसके तहत कुछ परिस्थितियों में उद्योगों को गुणवत्ता मानकों के पालन में अधिक लचीलापन दिया गया है। इसका उद्देश्य गुणवत्ता से समझौता किए बिना छोटे उद्योगों की लागत कम करना और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को मजबूत बनाना है।
क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) क्या है?
क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) केंद्र सरकार द्वारा जारी किया गया एक कानूनी आदेश है, जिसके तहत कुछ विशेष उत्पादों के लिए भारतीय गुणवत्ता मानकों (Indian Standards) का पालन करना अनिवार्य होता है। यह आदेश भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 (BIS Act, 2016) की धारा 16 के अंतर्गत जारी किया जाता है।

यदि किसी उत्पाद पर QCO लागू है, तो उसका निर्माण, बिक्री, आयात या वितरण तभी किया जा सकता है जब वह संबंधित भारतीय मानक (IS Standard) के अनुरूप हो और निर्माता के पास आवश्यक Bureau of Indian Standards (BIS) का लाइसेंस हो। इसका सबसे परिचित उदाहरण ISI मार्क है, जो उपभोक्ताओं को बताता है कि उत्पाद निर्धारित गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों पर खरा उतरता है।
भारत में गुणवत्ता नियंत्रण की आवश्यकता क्यों पड़ी?
कुछ वर्ष पहले तक भारतीय बाजार में अनेक ऐसे उत्पाद बिक रहे थे जिनकी गुणवत्ता असमान थी। कई वस्तुएं सुरक्षा मानकों पर खरी नहीं उतरती थीं, जिससे उपभोक्ताओं की जान-माल का जोखिम बढ़ जाता था। इसके अलावा घटिया गुणवत्ता वाले उत्पादों के कारण भारतीय निर्माताओं की अंतरराष्ट्रीय छवि भी प्रभावित होती थी।
इसी चुनौती को देखते हुए सरकार ने उत्पादों के लिए एक समान गुणवत्ता मानक लागू करने का निर्णय लिया। इससे उपभोक्ताओं को सुरक्षित उत्पाद मिलने लगे, उद्योगों में गुणवत्ता सुधार की प्रतिस्पर्धा बढ़ी और भारतीय उत्पादों की वैश्विक स्वीकार्यता मजबूत होने लगी।
BIS क्या है और इसकी भूमिका क्या है?
भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards – BIS) भारत का राष्ट्रीय मानकीकरण निकाय है। इसकी स्थापना उपभोक्ताओं को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण उत्पाद उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी।
BIS की प्रमुख जिम्मेदारियां हैं:
- भारतीय मानकों (Indian Standards) का निर्माण।
- उत्पादों की गुणवत्ता का परीक्षण।
- योग्य निर्माताओं को लाइसेंस जारी करना।
- ISI मार्क और अन्य प्रमाणन योजनाओं का संचालन।
- बाजार में उपलब्ध उत्पादों की नियमित निगरानी (Market Surveillance) करना।
- नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई करना।
BIS प्रमाणन कैसे प्राप्त होता है?
जब कोई निर्माता ऐसा उत्पाद बनाता है जिस पर QCO लागू है, तो उसे BIS के पास आवेदन करना होता है। इसके बाद उत्पाद का परीक्षण मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में किया जाता है। यदि उत्पाद निर्धारित भारतीय मानकों के अनुरूप पाया जाता है, तो निर्माता को BIS लाइसेंस जारी किया जाता है।
इसके बाद कंपनी अपने उत्पाद पर ISI Mark अथवा संबंधित BIS Standard Mark का उपयोग कर सकती है। यह प्रमाणन एक बार मिलने के बाद समाप्त नहीं हो जाता, बल्कि BIS समय-समय पर निरीक्षण और सैंपल परीक्षण करता रहता है ताकि गुणवत्ता लगातार बनी रहे।
क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर कैसे लागू किया जाता है?
हर उद्योग पर एक ही प्रकार का QCO लागू नहीं होता। विभिन्न मंत्रालय अपने-अपने क्षेत्र के उत्पादों के लिए अलग-अलग Quality Control Orders जारी करते हैं।
उदाहरण के लिए:
- खिलौने
- विद्युत उपकरण
- एयर कंडीशनर
- वॉशिंग मशीन
- फर्नीचर
- सुरक्षा जूते
- रबर फुटवियर
- हिंग्स (कब्जे)
- घरेलू जल हीटर
इन सभी के लिए अलग भारतीय मानक निर्धारित किए गए हैं और निर्माता को उन्हीं मानकों का पालन करना होता है।
QCO से देश को क्या लाभ हुआ?
विशेषज्ञों के अनुसार QCO लागू होने के बाद कई क्षेत्रों में उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। इससे उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ा है और निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों की बिक्री पर अंकुश लगा है।
सरकार का मानना है कि मजबूत गुणवत्ता प्रणाली से:
- भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय पहचान बेहतर होगी।
- निर्यात क्षमता बढ़ेगी।
- नकली एवं घटिया उत्पादों पर रोक लगेगी।
- घरेलू उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।
- विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
- उपभोक्ताओं को सुरक्षित और टिकाऊ उत्पाद मिलेंगे।
MSME उद्योगों की समस्या कहां से शुरू हुई?
जहां बड़े उद्योगों के लिए BIS मानकों का पालन अपेक्षाकृत आसान था, वहीं छोटे और सूक्ष्म उद्योगों के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन गया।
देश में MSME क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। सरकार के अनुसार भारत में 6.3 करोड़ से अधिक MSMEs कार्यरत हैं। ये देश के लगभग 30% GDP, करीब 36% विनिर्माण उत्पादन और 45% से अधिक निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं तथा 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते हैं। इसलिए इन उद्योगों की समस्याओं का समाधान राष्ट्रीय आर्थिक विकास से सीधे जुड़ा हुआ है।
छोटे उद्योगों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
एक छोटे कारखाने में अक्सर 5 से 20 कर्मचारी ही होते हैं। उनके पास न तो बड़े उद्योगों जैसी पूंजी होती है और न ही अलग से गुणवत्ता अनुपालन (Compliance) संभालने वाली टीम।

QCO लागू होने के बाद उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा:
- महंगे कच्चे माल की खरीद।
- BIS परीक्षण की लागत।
- दस्तावेज़ीकरण और तकनीकी प्रक्रिया।
- नियमित निरीक्षण।
- सप्लायर बदलने की मजबूरी।
- उत्पादन लागत में वृद्धि।
- छोटे ऑर्डर पर भी समान अनुपालन लागत।
इसी कारण MSME संगठनों ने सरकार से नियमों को अधिक व्यावहारिक बनाने की मांग की थी।
Scheme-I और Scheme-II क्या हैं?
यहीं से हालिया बदलाव को समझना आसान हो जाता है।
Scheme-I (ISI Mark Scheme)
यह BIS की सबसे प्रसिद्ध योजना है। इसके तहत उत्पाद का पूर्ण परीक्षण किया जाता है और निर्माता को ISI मार्क लगाने की अनुमति मिलती है। यह अपेक्षाकृत अधिक कठोर और व्यापक अनुपालन वाली व्यवस्था है।
Scheme-II (Conformity Assessment Regulations, 2018)
यह भी BIS की एक वैध प्रमाणन व्यवस्था है, लेकिन कुछ श्रेणियों में अलग प्रकार के मूल्यांकन और लाइसेंसिंग ढांचे के माध्यम से संचालित होती है। सरकार ने 2026 के नए आदेश में उद्योगों को कुछ परिस्थितियों में Scheme-II के तहत लाइसेंसधारी निर्माताओं से कच्चा माल और पुर्जे खरीदने की अनुमति देने का प्रावधान किया है। इसका उद्देश्य गुणवत्ता बनाए रखते हुए आपूर्ति श्रृंखला को अधिक लचीला बनाना है।
सरकार ने 2026 में क्या बड़ा बदलाव किया?
25 जून 2026 को DPIIT ने Transition Facilitation (Quality Control) Order, 2026 अधिसूचित किया। इसके तहत पात्र घरेलू उद्योगों को जोखिम-आधारित (Risk-based) प्रणाली के माध्यम से यह अनुमति दी जा सकती है कि वे कुछ उत्पादों के लिए केवल Scheme-I पर निर्भर रहने के बजाय Scheme-II लाइसेंसधारी निर्माताओं से भी आवश्यक इनपुट या सप्लाई प्राप्त करें।
यह अनुमति सभी को स्वतः नहीं मिलेगी। सरकार तकनीकी क्षमता, पूर्व अनुपालन रिकॉर्ड, अनुसंधान एवं विकास, तकनीकी उन्नयन तथा घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जैसे मानकों के आधार पर निर्णय लेगी। लगातार तीन वर्षों तक बिना किसी उल्लंघन के QCO का पालन करने वाले निर्माताओं को भी इस व्यवस्था का लाभ दिया जा सकता है। यह आदेश उद्योगों के लिए अनुपालन आसान बनाने के साथ-साथ गुणवत्ता बनाए रखने का प्रयास है।
किन उद्योगों को मिलेगा नई व्यवस्था का लाभ?
सरकार द्वारा जारी Transition Facilitation (Quality Control) Order, 2026 का उद्देश्य सभी उद्योगों को एक साथ छूट देना नहीं है। प्रारंभिक चरण में यह व्यवस्था उन उद्योगों पर लागू की गई है जहाँ कच्चे माल और पुर्जों (Components) की उपलब्धता सीमित होने के कारण उत्पादन प्रभावित हो रहा था।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- एयर कंडीशनर (Air Conditioners)
- वॉशिंग मशीन
- इलेक्ट्रिक वॉटर हीटर
- घरेलू विद्युत उपकरण
- फर्नीचर
- खिलौने
- रबर फुटवियर
- पर्सनल प्रोटेक्टिव फुटवियर (Safety Shoes)
- हिंग्स (Door Hinges)
- अन्य अधिसूचित इंजीनियरिंग उत्पाद

सरकार समय-समय पर आवश्यकता के अनुसार अन्य क्षेत्रों को भी इसमें शामिल कर सकती है। इसका उद्देश्य उद्योगों की वास्तविक कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए चरणबद्ध तरीके से सुधार लागू करना है।
क्या सभी कंपनियों को यह राहत मिलेगी?
यह एक सामान्य छूट (Blanket Exemption) नहीं है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल वही कंपनियाँ इस सुविधा का लाभ उठा सकेंगी जो निर्धारित पात्रता (Eligibility) पूरी करेंगी।
इसके लिए कई महत्वपूर्ण शर्तें रखी गई हैं, जैसे:
- कंपनी का अनुपालन रिकॉर्ड अच्छा होना चाहिए।
- QCO नियमों के उल्लंघन का इतिहास नहीं होना चाहिए।
- गुणवत्ता नियंत्रण की आंतरिक व्यवस्था हो।
- तकनीकी क्षमता एवं उत्पादन प्रणाली विश्वसनीय हो।
- घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की स्पष्ट योजना हो।
- आवश्यकता पड़ने पर BIS निरीक्षण स्वीकार करना होगा।
इस प्रकार सरकार ने राहत और गुणवत्ता नियंत्रण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है।
Risk-Based Mechanism क्या है?
नई व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू Risk-Based Assessment Mechanism है।
पहले लगभग सभी निर्माताओं के लिए समान प्रकार के नियम लागू होते थे, चाहे उनका रिकॉर्ड कैसा भी रहा हो। अब सरकार प्रत्येक कंपनी का जोखिम (Risk Profile) देखकर निर्णय लेगी।
यदि कोई कंपनी वर्षों से लगातार गुणवत्तापूर्ण उत्पादन कर रही है, कभी नियमों का उल्लंघन नहीं किया है और उसका निरीक्षण रिकॉर्ड अच्छा है, तो उसे अधिक लचीलापन दिया जा सकता है।
इसके विपरीत यदि किसी निर्माता का रिकॉर्ड खराब है, गुणवत्ता संबंधी शिकायतें अधिक हैं या पहले नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो उस पर पहले जैसी सख्त निगरानी जारी रहेगी।
यह प्रणाली विकसित देशों की Regulatory Practices के अनुरूप मानी जा रही है।
Implementation Committee की क्या भूमिका होगी?
नई नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सरकार ने एक Implementation Committee गठित की है।
इस समिति में प्रमुख रूप से शामिल होंगे:
- उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT)
- भारतीय मानक ब्यूरो (BIS)
- उपभोक्ता मामले विभाग
- विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT)
- संबंधित मंत्रालयों के प्रतिनिधि
समिति यह तय करेगी कि कौन-सी कंपनियाँ नई व्यवस्था के लिए पात्र हैं तथा नियमों का पालन सही तरीके से हो रहा है या नहीं।
क्या गुणवत्ता से समझौता होगा?
यह सबसे बड़ा प्रश्न है।
पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि सरकार ने गुणवत्ता मानकों में ढील दे दी है, लेकिन वास्तविक स्थिति कुछ अलग है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि:
- अंतिम उत्पाद को आज भी निर्धारित भारतीय मानक (Indian Standard) का पालन करना होगा।
- BIS निरीक्षण पहले की तरह जारी रहेगा।
- बाजार से उत्पादों के नमूने लेकर परीक्षण किया जाएगा।
- गुणवत्ता में कमी पाए जाने पर लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।
- कानूनी कार्रवाई भी संभव है।
अर्थात राहत केवल उत्पादन प्रक्रिया को व्यावहारिक बनाने के लिए दी गई है, अंतिम गुणवत्ता से समझौता करने के लिए नहीं।
उपभोक्ताओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
यदि नई व्यवस्था सही तरीके से लागू होती है तो उपभोक्ताओं को कई लाभ मिल सकते हैं।
पहला, छोटे उद्योगों की उत्पादन लागत कम होगी जिससे कुछ उत्पादों की कीमतों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
दूसरा, बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता बेहतर होगी क्योंकि कच्चे माल की कमी के कारण उत्पादन रुकने की समस्या कम होगी।
तीसरा, अंतिम उत्पादों पर BIS मानक लागू रहेंगे, इसलिए उपभोक्ताओं की सुरक्षा भी बनी रहेगी।
हालाँकि यदि निगरानी कमजोर हुई तो निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों के बाजार में आने का खतरा भी बना रहेगा। इसलिए प्रभावी निरीक्षण सबसे महत्वपूर्ण होगा।
MSME क्षेत्र के लिए यह फैसला कितना महत्वपूर्ण है?
भारत का MSME क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता माना जाता है।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार:
- भारत में 6.3 करोड़ से अधिक MSMEs हैं।
- यह क्षेत्र 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है।
- देश के लगभग 30% सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान देता है।
- करीब 36% विनिर्माण उत्पादन MSME क्षेत्र से आता है।
- भारत के लगभग 45% निर्यात में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
ऐसे में यदि इस क्षेत्र की अनुपालन लागत कम होती है तो इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव रोजगार, निवेश और उत्पादन पर पड़ सकता है।
क्या इससे ‘मेक इन इंडिया‘ अभियान को मजबूती मिलेगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय Make in India और Atmanirbhar Bharat अभियान को मजबूती दे सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में कई उद्योगों ने शिकायत की थी कि कठोर QCO नियमों के कारण घरेलू आपूर्ति श्रृंखला विकसित होने से पहले ही महंगे प्रमाणित कच्चे माल पर निर्भर होना पड़ रहा था।
नई व्यवस्था से:
- स्थानीय सप्लायरों को अवसर मिलेगा।
- घरेलू Manufacturing Ecosystem मजबूत होगा।
- आयात पर निर्भरता कम हो सकती है।
- भारतीय कंपनियाँ वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
भारत में QCO का लगातार विस्तार
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने Quality Control Orders का दायरा तेजी से बढ़ाया है।
आज विभिन्न मंत्रालयों द्वारा सैकड़ों उत्पादों पर QCO लागू किए जा चुके हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- स्टील उत्पाद
- सीमेंट
- इलेक्ट्रिकल उपकरण
- केबल
- खिलौने
- फर्नीचर
- रसायन
- मशीनरी
- घरेलू उपकरण
- सुरक्षा उपकरण
- औद्योगिक उत्पाद
सरकार का लक्ष्य है कि भारत में बनने और बिकने वाले अधिकांश महत्वपूर्ण उत्पाद अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हों।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुणवत्ता नियंत्रण क्यों आवश्यक है?
आज वैश्विक व्यापार में केवल कम कीमत पर्याप्त नहीं होती।
यूरोप, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया सहित अधिकांश विकसित देशों में गुणवत्ता मानकों का पालन अनिवार्य है।
यदि भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरते हैं तो:
- निर्यात बढ़ेगा।
- विदेशी बाजारों में भारतीय ब्रांडों की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
- आयातकों का विश्वास मजबूत होगा।
- व्यापारिक विवाद कम होंगे।
इसी कारण भारत गुणवत्ता सुधार को केवल घरेलू नीति नहीं बल्कि निर्यात रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहा है।
विशेषज्ञों की राय
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार ने इस बार संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है।
यदि नियम बहुत कठोर होंगे तो छोटे उद्योग बंद हो सकते हैं।
यदि नियम बहुत ढीले होंगे तो गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
नई Risk-Based प्रणाली इन दोनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है।
हालाँकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सरकार को बाजार निगरानी और परीक्षण प्रणाली को पहले से अधिक मजबूत बनाना होगा ताकि राहत का गलत लाभ न उठाया जा सके।
नई नीति के प्रमुख लाभ
नई व्यवस्था से संभावित लाभ:
- MSME की अनुपालन लागत कम होगी।
- कच्चे माल की उपलब्धता बेहतर होगी।
- उत्पादन में देरी कम होगी।
- घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी।
- निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा।
- रोजगार बढ़ने की संभावना होगी।
- Ease of Doing Business में सुधार होगा।
- अंतिम उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने का प्रयास जारी रहेगा।
संभावित चुनौतियाँ
हालाँकि कुछ चुनौतियाँ भी सामने आ सकती हैं:
- यदि निगरानी कमजोर रही तो गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
- कुछ कंपनियाँ राहत का गलत उपयोग करने की कोशिश कर सकती हैं।
- छोटे और बड़े उद्योगों के बीच प्रतिस्पर्धा का नया संतुलन बनाना होगा।
- निरीक्षण व्यवस्था को और आधुनिक बनाना पड़ेगा।
- BIS की परीक्षण क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता होगी।
भविष्य की दिशा
सरकार का संकेत है कि आने वाले वर्षों में गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली को और अधिक डिजिटल, जोखिम–आधारित (Risk-Based) तथा उद्योग–अनुकूल बनाया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुणवत्ता, नवाचार और Ease of Doing Business के बीच संतुलन बना रहा तो भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।
सूचनिका 365 इनसाइट्स
क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर भारत में गुणवत्ता सुधार की एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं को सुरक्षित उत्पाद उपलब्ध कराना, भारतीय उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना तथा निर्यात बढ़ाना है।
हाल ही में MSME क्षेत्र को दी गई राहत यह दर्शाती है कि सरकार गुणवत्ता मानकों को बनाए रखते हुए छोटे उद्योगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान भी करना चाहती है। यदि इस नीति का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ, तो इससे उद्योगों की लागत कम होगी, रोजगार बढ़ेगा, घरेलू विनिर्माण मजबूत होगा और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में भी वृद्धि होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. Quality Control Order (QCO) क्या है?
यह सरकार द्वारा जारी अनिवार्य गुणवत्ता आदेश है जिसके तहत अधिसूचित उत्पादों को BIS द्वारा निर्धारित भारतीय मानकों का पालन करना होता है।
Q2. QCO किस कानून के तहत लागू किया जाता है?
Bureau of Indian Standards (BIS) Act, 2016 के तहत।
Q3. सरकार ने MSME को क्या राहत दी है?
पात्र घरेलू निर्माताओं को कुछ मामलों में Scheme-II लाइसेंसधारी निर्माताओं से कच्चा माल एवं पुर्जे खरीदने की अनुमति दी गई है, जिससे अनुपालन लागत कम होगी।
Q4. क्या गुणवत्ता मानकों में ढील दी गई है?
नहीं। अंतिम उत्पाद को अभी भी BIS द्वारा निर्धारित भारतीय मानकों का पालन करना होगा।
Q5. इस निर्णय का सबसे बड़ा लाभ क्या होगा?
MSME की लागत कम होगी, उत्पादन आसान होगा, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा और उपभोक्ताओं को गुणवत्ता युक्त उत्पाद मिलते रहेंगे।
आधिकारिक एवं विश्वसनीय स्रोत
- Press Information Bureau (PIB)
- Bureau of Indian Standards (BIS)
- Department for Promotion of Industry and Internal Trade (DPIIT)
- Ministry of Commerce & Industry
- MSME Ministry
