मेघालय में रेलवे विस्तार

मेघालय में रेलवे विस्तार क्यों रुका है ?


मेघालय में रेलवे – विकास और पहचान की जंग

भारत का रेलवे नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, रेगिस्तान से पहाड़ों तक और महानगरों से दूर-दराज़ गांवों तक रेल देश की जीवनरेखा मानी जाती है। लेकिन इसी भारत में एक ऐसा राज्य भी है जहां आज तक रेल संपर्क एक राजनीतिक, सामाजिक और भावनात्मक बहस का विषय बना हुआ है। वह राज्य है मेघालय।

करीब 40 लाख आबादी वाले मेघालय में आज केवल एक ही सक्रिय रेलवे स्टेशन है Mendipathar Railway Station। यह स्टेशन 2014 में शुरू हुआ था और आज भी पूरे राज्य का एकमात्र परिचालित रेलवे स्टेशन है। दूसरी ओर राज्य की राजधानी Shillong अब तक भारतीय रेलवे मानचित्र से बाहर है। यह स्थिति तब फिर चर्चा में आई जब Amit Shah के मेघालय दौरे के दौरान इनर लाइन परमिट (ILP) और रेलवे विस्तार का मुद्दा फिर से सुर्खियों में आ गया।

मेघालय में सिर्फ एक रेलवे स्टेशन क्यों?

जब कोई पहली बार सुनता है कि पूरे मेघालय में सिर्फ एक रेलवे स्टेशन है, तो उसे विश्वास करना मुश्किल लगता है। लेकिन यह सच है। राज्य का एकमात्र रेलवे स्टेशन मेंडीपाथर है, जो उत्तर गारो हिल्स जिले में स्थित है।

रेलवे स्टेशन मेंडीपाथर
मेंदीपाथर रेलवे स्टेशन

यह स्टेशन 2014 में शुरू हुआ और गुवाहाटी से जुड़ता है। हाल के वर्षों में यहां मालगाड़ियों का संचालन भी शुरू हुआ है, जिससे स्थानीय व्यापार को कुछ लाभ मिला है।

दिलचस्प बात यह है कि रेलवे ने मेघालय में प्रवेश करने के कई प्रयास किए, लेकिन लगभग हर बार विरोध के कारण परियोजनाएं रुक गईं।

पहली बड़ी परियोजना: टेटेलिया–बर्नीहाट रेल लाइन

2010 में केंद्र सरकार ने असम के टेटेलिया से मेघालय के बर्नीहाट तक लगभग 21.5 किलोमीटर लंबी रेल लाइन को मंजूरी दी थी। परियोजना का अधिकांश कार्य असम की सीमा तक पूरा हो चुका है और लगभग 19 किलोमीटर ट्रैक बिछाया जा चुका है।

लेकिन जैसे ही परियोजना मेघालय की सीमा तक पहुंची, स्थानीय विरोध के कारण काम रुक गया। स्थिति ऐसी बन गई कि रेलवे को इस लाइन को असम सीमा पर ही समाप्त करने पर विचार करना पड़ा।

शिलांग तक रेलवे पहुंचाने की योजना भी ठप

2011 में एक और महत्वाकांक्षी योजना बनाई गई। इस परियोजना के तहत बर्नीहाट से शिलांग तक लगभग 108 किलोमीटर लंबी रेल लाइन प्रस्तावित की गई थी, जिसमें 10 रेलवे स्टेशन बनने थे।

भूमि अधिग्रहण के लिए केंद्र सरकार ने 200 करोड़ रुपये से अधिक की राशि भी जारी की। लेकिन स्थानीय विरोध, भूमि अधिग्रहण की समस्याओं और राजनीतिक सहमति के अभाव में परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। वर्षों बाद भी शिलांग रेलवे स्टेशन से वंचित है।

जैंतिया हिल्स की नई परियोजना भी विवादों में

2023 में रेलवे ने एक नई रेल लाइन का प्रस्ताव रखा, जो असम से जैंतिया हिल्स क्षेत्र के जोवाई को जोड़ सकती थी। लेकिन सर्वेक्षण चरण में ही इस परियोजना का विरोध शुरू हो गया।

यानी तीन अलग-अलग परियोजनाएं, तीन अलग-अलग समय और तीन अलग-अलग मार्ग—लेकिन परिणाम लगभग एक जैसा रहा: विरोध और ठहराव।

असली विवाद रेलवे नहीं, पहचान का है

मेघालय में रेलवे विरोध को केवल परिवहन या विकास का मुद्दा मानना गलत होगा। राज्य के कई आदिवासी संगठनों का मानना है कि रेलवे आने से बाहरी लोगों का आगमन बढ़ेगा और इससे स्थानीय समुदायों की पहचान खतरे में पड़ सकती है।

मेघालय मुख्य रूप से खासी, जयंतिया और गारो समुदायों का घर है। इन समुदायों की आबादी राष्ट्रीय स्तर पर बहुत छोटी है। इसलिए जनसांख्यिकीय बदलाव का डर यहां एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा है।

KSU और अन्य संगठनों की चिंता

Khasi Students’ Union (KSU) और कई अन्य स्थानीय संगठन 1980 के दशक से रेलवे विस्तार का विरोध करते रहे हैं।

उनका तर्क है कि रेलवे के जरिए बड़ी संख्या में बाहरी लोग राज्य में आ सकते हैं। इससे स्थानीय लोगों की जमीन, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान पर दबाव बढ़ सकता है।

संगठनों का कहना है कि सड़क मार्ग पर कुछ हद तक निगरानी संभव है, लेकिन एक ट्रेन एक साथ सैकड़ों लोगों को ला सकती है। यदि प्रवेश को नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं होगी, तो भविष्य में जनसंख्या संतुलन बदल सकता है।

ILP क्या है और इसकी मांग क्यों हो रही है?

इसी संदर्भ में इनर लाइन परमिट (ILP) का मुद्दा सामने आता है।

ILP एक विशेष प्रवेश परमिट प्रणाली है जिसके तहत बाहरी लोगों को कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में प्रवेश करने से पहले अनुमति लेनी होती है।

वर्तमान में Arunachal Pradesh, Nagaland, Mizoram और Manipur में ILP लागू है।

मेघालय विधानसभा ने 2019 में ILP लागू करने का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन अभी तक केंद्र सरकार की अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। यही कारण है कि कई संगठन कहते हैं—“पहले ILP, फिर रेलवे।”

क्या सभी लोग रेलवे के विरोध में हैं?

नहीं। यही इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू है।

राज्य के कई अर्थशास्त्री, पूर्व नौकरशाह, उद्योग संगठन और राजनीतिक नेता रेलवे का समर्थन करते हैं। उनका तर्क है कि रेलवे के बिना मेघालय की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है।

राज्य की लगभग 75 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। अधिकांश सामान सड़क मार्ग से आता है, जिससे परिवहन लागत बढ़ जाती है। नतीजतन रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो जाती हैं और स्थानीय उत्पाद राष्ट्रीय बाजार तक आसानी से नहीं पहुंच पाते।

मुख्यमंत्री क्या कहते हैं?

Conrad Sangma कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि रेलवे से माल ढुलाई सस्ती होगी, व्यापार बढ़ेगा और युवाओं के लिए अवसर पैदा होंगे।

राज्य सरकार का मानना है कि बेहतर परिवहन नेटवर्क पर्यटन, कृषि और छोटे उद्योगों को भी गति देगा।

गारो हिल्स का नजरिया अलग

खासी हिल्स में जहां रेलवे को लेकर संदेह अधिक है, वहीं गारो हिल्स क्षेत्र में स्थिति अलग दिखाई देती है।

कई स्थानीय प्रतिनिधि मेंडीपाथर लाइन को दक्षिण गारो हिल्स तक बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि रेलवे से क्षेत्र का आर्थिक विकास होगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

क्या ILP और रेलवे साथ–साथ चल सकते हैं?

यह सवाल आज मेघालय की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है।

रेलवे समर्थकों का तर्क है कि यदि मिजोरम और नागालैंड जैसे राज्यों में ILP के साथ रेलवे काम कर सकती है, तो मेघालय में भी ऐसा मॉडल अपनाया जा सकता है। हाल के वर्षों में मिजोरम के नए रेलवे संपर्क के साथ ILP व्यवस्था लागू रखी गई है और प्रवेश की निगरानी भी की जा रही है।

इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि रेलवे और आदिवासी संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उचित कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था के जरिए दोनों उद्देश्यों को साथ-साथ हासिल किया जा सकता है।

विकास बनाम पहचान: मेघालय की सबसे बड़ी दुविधा

मेघालय आज दो महत्वपूर्ण जरूरतों के बीच खड़ा है।

एक तरफ बेहतर परिवहन, कम कीमतें, रोजगार, पर्यटन और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जुड़ाव की आवश्यकता है।

दूसरी तरफ स्थानीय समुदायों की भाषा, संस्कृति, भूमि और पहचान को सुरक्षित रखने की चिंता है।

दोनों पक्षों के तर्क मजबूत हैं। यही वजह है कि यह विवाद केवल रेलवे परियोजना का नहीं बल्कि विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन खोजने का संघर्ष बन गया है।

आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

फिलहाल स्थिति यह है कि रेलवे की कई परियोजनाएं वर्षों से अटकी हुई हैं। कुछ परियोजनाओं पर तकनीकी रूप से प्रगति हुई है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक सहमति अभी भी नहीं बन पाई है। दूसरी ओर ILP की मांग भी लगातार बनी हुई है और इस पर अंतिम निर्णय केंद्र सरकार के हाथ में है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान टकराव में नहीं बल्कि संवाद में है। यदि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय संगठन मिलकर ऐसा ढांचा तैयार करें जिसमें ILP जैसी सुरक्षा व्यवस्था और आधुनिक रेलवे नेटवर्क दोनों शामिल हों, तो मेघालय को विकास और पहचान दोनों मिल सकते हैं।

आज रेलवे ट्रैक असम सीमा तक पहुंच चुका है, लेकिन आगे बढ़ने के लिए राजनीतिक सहमति और सामाजिक विश्वास की जरूरत है।

सूचनिका 365 इनसाइट्स

मेघालय की रेलवे कहानी केवल पटरियों और ट्रेनों की कहानी नहीं है। यह उस राज्य की कहानी है जो विकास चाहता है, लेकिन अपनी पहचान खोने से भी डरता है।

शायद सवाल यह नहीं है कि मेघालय को रेलवे चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या ऐसा मॉडल बनाया जा सकता है जिसमें रेलवे भी आए और स्थानीय समुदायों की चिंताएं भी दूर हों।

जब तक इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक रेल की पटरियां सीमा पर इंतजार करती रहेंगी और शिलांग भारत की उन दुर्लभ राज्य राजधानियों में शामिल रहेगा जहां अभी तक ट्रेन नहीं पहुंची है।

जब तक इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, तब तक मेंडीपाथर राज्य का अकेला रेलवे स्टेशन बना रहेगा और शिलांग की पहाड़ियां दूर से गुजरती ट्रेनों को देखती रहेंगी।

प्रामाणिक स्रोत

  1. NFR/Indian Railways
  2. Ministry of Railways
  3. Meghalaya Government
  4. Indian Express (Rail Connectivity in Meghalaya)
  5. Northeast Frontier Railway

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