भारत में घटती एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग पर NFHS-6 की बड़ी चेतावनी

भारत में घटती एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग पर NFHS-6 की बड़ी चेतावनी


एक अच्छी खबर और उसके पीछे छिपी चिंताजनक सच्चाई

पिछले एक दशक में भारत ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य (Maternal & Child Health) के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। सरकारी अस्पतालों की संख्या बढ़ी है, संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) में तेजी आई है, गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच (ANC) पहले से बेहतर हुई है और बच्चों का टीकाकरण भी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुका है।

यदि केवल इन आंकड़ों को देखा जाए तो ऐसा लगता है कि भारत शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है।

लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6, 2023-24) ने एक ऐसा तथ्य सामने रखा है जिसने बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों, बाल रोग चिकित्सकों, पोषण वैज्ञानिकों और WHO तक को चिंता में डाल दिया है।

भारत में जन्म के पहले छह महीने तक केवल मां का दूध (Exclusive Breastfeeding) पाने वाले बच्चों की संख्या पहली बार उल्लेखनीय रूप से घट गई है। यह गिरावट ऐसे समय आई है जब अस्पतालों में प्रसव, मातृ स्वास्थ्य सेवाएं और डिजिटल जागरूकता तीनों पहले से कहीं बेहतर हैं।

यानी भारत ने अस्पताल तो बना लिए, लेकिन शायद स्तनपान की संस्कृति को उसी गति से मजबूत नहीं कर पाया।

आखिर क्यों महत्वपूर्ण है यह रिपोर्ट?

अधिकांश लोगों को लगता है कि स्तनपान केवल एक व्यक्तिगत या पारिवारिक निर्णय है।

वास्तव में ऐसा नहीं है।

WHO इसे दुनिया की सबसे प्रभावी, सबसे सस्ती और सबसे सुरक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों (Public Health Intervention) में से एक मानता है।

कारण स्पष्ट है

एक नवजात शिशु का पूरा प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) जन्म के समय पूर्ण विकसित नहीं होता।

उसका पाचन तंत्र भी अत्यंत संवेदनशील होता है।

उसके शरीर में संक्रमण से लड़ने वाली प्रतिरक्षी कोशिकाएं (Antibodies) सीमित होती हैं।

ऐसे समय मां का दूध केवल भोजन नहीं होता बल्कि

  • पहली वैक्सीन,
  • पहला पोषण,
  • पहली प्रतिरक्षा,
  • पहला मानसिक विकास कार्यक्रम,
  • और जीवन की पहली सुरक्षा कवच बन जाता है।

WHO का कहना है कि जीवन के पहले छह महीनों में केवल स्तनपान बच्चों के जीवित रहने, संक्रमण से बचाव और स्वस्थ विकास के लिए सबसे प्रभावी उपायों में से एक है।

NFHS-6 क्या है और इसके आंकड़े इतने महत्वपूर्ण क्यों माने जाते हैं?

भारत में स्वास्थ्य संबंधी सबसे बड़ा और सबसे विश्वसनीय सर्वेक्षण National Family Health Survey (NFHS) है।

इसे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सहयोग से International Institute for Population Sciences (IIPS), मुंबई संचालित करता है।

NFHS-6 (2023-24) की प्रमुख विशेषताएं

  • लगभग 6.79 लाख परिवारों का सर्वेक्षण
  • 715 जिलों को शामिल किया गया
  • हजारों प्रशिक्षित सर्वेक्षणकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर जानकारी एकत्रित की गई
  • मातृ स्वास्थ्य, शिशु स्वास्थ्य, पोषण, महिलाओं की स्थिति, प्रजनन स्वास्थ्य, टीकाकरण, एनीमिया, जीवनशैली रोग, डिजिटल उपयोग आदि पर विस्तृत जानकारी संकलित की गई।

यही कारण है कि भारत की लगभग सभी स्वास्थ्य नीतियां, पोषण योजनाएं और कई सरकारी कार्यक्रम NFHS के आंकड़ों पर आधारित होते हैं।

NFHS-6 की सबसे बड़ी चेतावनी क्या है?

रिपोर्ट में कई सकारात्मक उपलब्धियां दर्ज हुईं

भारत ने क्या हासिल किया?

संकेतकNFHS-5NFHS-6परिवर्तन
संस्थागत प्रसव88.6%90.6%▲ +2.0%
गर्भवती महिलाओं की ANC कवरेज92.6%95.9%▲
पहली तिमाही में पंजीकरण70.0%76.2%▲
चार या अधिक ANC विजिट58.5%65.2%▲
12–23 माह के बच्चों का टीकाकरणलगभग 76%96% से अधिक▲
इंटरनेट उपयोग करने वाली महिलाएं33.3%64.3%लगभग दोगुना

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है।

लेकिन इसके ठीक नीचे एक ऐसा आंकड़ा दर्ज है जिसने पूरी रिपोर्ट की दिशा बदल दी।

भारत में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग क्यों घट गई?

NFHS-5 (2019-21) में

63.7%

बच्चों को जन्म के बाद पहले छह महीने तक केवल मां का दूध दिया जा रहा था।

NFHS-6 (2023-24) में यही आंकड़ा घटकर

55.8%

रह गया।

अर्थात केवल तीन-चार वर्षों में लगभग 8 प्रतिशत अंक की गिरावट दर्ज हुई।

यदि इसे वास्तविक संख्या में समझें तो भारत में हर वर्ष लगभग 2.3 से 2.5 करोड़ बच्चों का जन्म होता है। ऐसे में 8 प्रतिशत अंकों की गिरावट का अर्थ लाखों अतिरिक्त शिशुओं का समय से पहले फॉर्मूला मिल्क, पानी, पशु दूध या अन्य भोजन से परिचित होना है।

यह गिरावट इतनी गंभीर क्यों मानी जा रही है?

क्योंकि पिछले लगभग 15 वर्षों में भारत लगातार सुधार कर रहा था।

एक समय था जब देश में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की दर लगातार बढ़ रही थी।

NFHS-3 से NFHS-4 और फिर NFHS-5 तक भारत ने उल्लेखनीय सुधार किया था।

लेकिन NFHS-6 ने पहली बार इस सकारात्मक प्रवृत्ति को उलट दिया।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे “Reversal of Progress” कह रहे हैं।

यानी जो उपलब्धि वर्षों में हासिल हुई थी, वह कुछ ही वर्षों में कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।

एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग वास्तव में होती क्या है?

कई परिवारों में यह गलतफहमी होती है कि

“यदि बच्चा मां का दूध पी रहा है और साथ में थोड़ा पानी या शहद भी दिया जा रहा है, तब भी उसे स्तनपान ही माना जाएगा।”

लेकिन WHO की परिभाषा इससे बिल्कुल अलग है।

Exclusive Breastfeeding का अर्थ है

जन्म से लेकर पूरे छह महीने तक बच्चे को केवल मां का दूध मिले।

इस अवधि में निम्न चीजें नहीं दी जानी चाहिए

  • पानी
  • शहद
  • घुट्टी
  • गाय का दूध
  • भैंस का दूध
  • बकरी का दूध
  • ऊंट का दूध
  • फॉर्मूला मिल्क
  • जूस
  • दलिया
  • खिचड़ी
  • सेरेलैक
  • कोई अन्य ठोस भोजन

केवल डॉक्टर द्वारा आवश्यक बताए गए

  • दवाइयां,
  • विटामिन,
  • मिनरल सप्लीमेंट,
  • ORS

ही अपवाद माने जाते हैं।

पहला पीला दूध (Colostrum) आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों होता है?

जब बच्चा जन्म लेता है तब शुरुआती 2–4 दिनों तक मां के स्तनों से गाढ़ा पीला दूध निकलता है।

कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसे “गंदा दूध” समझकर फेंक दिया जाता है।

वास्तव में यही कोलोस्ट्रम (Colostrum) नवजात के लिए सबसे कीमती पोषण है।

इसमें भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं

  • Immunoglobulin A (IgA)
  • Lactoferrin
  • Leukocytes
  • Growth Factors
  • Vitamin A
  • प्रोटीन
  • प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक तत्व

यही कारण है कि WHO इसे बच्चे की पहली वैक्सीन (First Vaccine) कहता है।

यह

  • आंतों को संक्रमण से बचाता है,
  • बैक्टीरिया के प्रवेश को रोकता है,
  • नवजात की प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय करता है,
  • और जीवन के शुरुआती दिनों में मृत्यु के जोखिम को कम करता है।

यदि पहले छह महीनों में केवल मां का दूध दिया जाए, तो यह न केवल बच्चे को संक्रमणों से बचाता है, बल्कि उसके मस्तिष्क, हृदय, पाचन तंत्र, प्रतिरक्षा प्रणाली और भविष्य के स्वास्थ्य की मजबूत नींव भी रखता है। यही कारण है कि WHO, UNICEF और भारतीय बाल रोग अकादमी (IAP) इसे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण पोषण रणनीति मानते हैं।

मां का दूध केवल भोजन नहीं, बल्कि जीवित जैविक सुरक्षा कवच है

कई लोग सोचते हैं कि मां का दूध केवल प्रोटीन, वसा (Fat), कार्बोहाइड्रेट और विटामिन का मिश्रण है। लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान बताता है कि यह एक “Live Biological Fluid” है, अर्थात ऐसा जीवित जैविक तरल जिसमें हजारों सक्रिय जैविक तत्व मौजूद होते हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, मां के दूध में 200 से अधिक जैव–सक्रिय (Bioactive) घटक पाए जाते हैं, जिनमें एंटीबॉडी, हार्मोन, एंजाइम, स्टेम सेल, ग्रोथ फैक्टर, लाभकारी बैक्टीरिया (Probiotics), प्रीबायोटिक्स और विशेष प्रकार की शर्कराएं (Human Milk Oligosaccharides – HMOs) शामिल हैं। यही कारण है कि आज तक कोई भी फॉर्मूला मिल्क इन सभी तत्वों की पूरी तरह बराबरी नहीं कर पाया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मां के दूध की संरचना बच्चे की उम्र के अनुसार बदलती रहती है। जन्म के तुरंत बाद निकलने वाला कोलोस्ट्रम, उसके बाद का ट्रांजिशनल मिल्क और फिर मैच्योर मिल्क तीनों की पोषण संरचना अलग होती है ताकि बच्चे की बदलती जरूरतें पूरी हो सकें।

बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसे विकसित होती है?

जन्म के समय नवजात का प्रतिरक्षा तंत्र पूरी तरह विकसित नहीं होता। इसलिए शुरुआती महीनों में वह बैक्टीरिया, वायरस और फंगल संक्रमण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है।

मां का दूध इस कमजोरी की भरपाई करता है।

इसमें मौजूद प्रमुख तत्व

  • Immunoglobulin A (IgA) – श्वसन और पाचन तंत्र की सुरक्षा करता है।
  • Lactoferrin – हानिकारक बैक्टीरिया की वृद्धि रोकता है।
  • Lysozyme – बैक्टीरिया को नष्ट करने में मदद करता है।
  • White Blood Cells – संक्रमण से लड़ने में सहायता करते हैं।
  • Human Milk Oligosaccharides (HMOs) – लाभकारी आंत बैक्टीरिया को बढ़ाते हैं और हानिकारक जीवाणुओं को आंत से चिपकने नहीं देते।

यही कारण है कि जिन बच्चों को पहले छह महीने केवल मां का दूध मिलता है, उनमें डायरिया, निमोनिया, कान के संक्रमण और पेट संबंधी बीमारियां काफी कम देखी जाती हैं।

डायरिया और निमोनिया से कैसे बचाता है स्तनपान?

भारत में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में लंबे समय तक डायरिया और निमोनिया शामिल रहे हैं।

जब छोटे बच्चे को समय से पहले पानी, गाय का दूध, शहद या अन्य भोजन दिया जाता है, तो उसके शरीर में बाहरी जीवाणु प्रवेश करने की संभावना बढ़ जाती है।

विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती, वहां जोखिम और बढ़ जाता है।

WHO के अनुसार

  • एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग डायरिया के मामलों को उल्लेखनीय रूप से कम करती है।
  • श्वसन संक्रमण (Respiratory Infection) का खतरा भी घटता है।
  • अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता कम पड़ती है।
  • नवजात मृत्यु का जोखिम भी कम होता है।

इसी कारण WHO जन्म के पहले छह महीनों में पानी तक न देने की सलाह देता है, क्योंकि मां के दूध में लगभग 87 प्रतिशत पानी होता है और सामान्य परिस्थितियों में यह बच्चे की पानी की आवश्यकता भी पूरी कर देता है।

क्या स्तनपान बच्चे के दिमाग के विकास में भी मदद करता है?

इस प्रश्न पर पिछले दो दशकों में सैकड़ों वैज्ञानिक अध्ययन किए गए हैं।

मां के दूध में पाए जाने वाले DHA (Docosahexaenoic Acid), ARA (Arachidonic Acid), कोलीन, आवश्यक फैटी एसिड और अन्य पोषक तत्व मस्तिष्क एवं आंखों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह पाया गया है कि पर्याप्त समय तक स्तनपान पाने वाले बच्चों में

  • भाषा विकास बेहतर हो सकता है।
  • सीखने की क्षमता अधिक विकसित होती है।
  • स्मरण शक्ति बेहतर हो सकती है।
  • विद्यालयी प्रदर्शन में सकारात्मक प्रभाव देखा गया है।
  • व्यवहार संबंधी समस्याएं अपेक्षाकृत कम हो सकती हैं।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि बच्चे की बुद्धिमत्ता केवल स्तनपान पर निर्भर नहीं करती। आनुवंशिकता, पारिवारिक वातावरण, शिक्षा, पोषण और सामाजिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए स्तनपान को समग्र विकास के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि एकमात्र निर्धारक के रूप में।

कुपोषण रोकने में कितनी महत्वपूर्ण है स्तनपान?

भारत आज भी दुनिया में बच्चों में कुपोषण की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक का सामना कर रहा है।

NFHS-6 के अनुसार, भले ही कई पोषण संकेतकों में सुधार हुआ है, लेकिन लाखों बच्चे अब भी

  • कम वजन,
  • ठिगनेपन (Stunting),
  • दुबलापन (Wasting),
  • तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी

से प्रभावित हैं।

मां का दूध जीवन के पहले छह महीनों में बच्चे की लगभग सभी पोषण आवश्यकताओं को पूरा करता है। इससे

  • कुपोषण की संभावना घटती है।
  • सुरक्षित वजन बढ़ता है।
  • मांसपेशियों और हड्डियों का विकास बेहतर होता है।
  • पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है।

क्या भविष्य में मोटापा और मधुमेह का खतरा भी कम हो सकता है?

हाल के वर्षों में कई शोधों ने संकेत दिया है कि पर्याप्त अवधि तक स्तनपान पाने वाले बच्चों में आगे चलकर

  • मोटापा,
  • टाइप-2 मधुमेह,
  • उच्च रक्तचाप,
  • मेटाबॉलिक सिंड्रोम

का जोखिम कुछ हद तक कम हो सकता है।

हालांकि वैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि इन बीमारियों पर भोजन, व्यायाम, आनुवंशिकता और जीवनशैली जैसे अनेक अन्य कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।

स्तनपान केवल बच्चे के लिए नहीं, मां के लिए भी जीवनरक्षक

अक्सर चर्चा केवल बच्चे तक सीमित रहती है, जबकि स्तनपान मां के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और अनेक चिकित्सा अध्ययनों के अनुसार नियमित स्तनपान से

1. स्तन कैंसर का जोखिम घटता है

जितनी लंबी अवधि तक स्तनपान कराया जाता है, उतना ही स्तन कैंसर का जोखिम कम होने के प्रमाण मिले हैं।

2. ओवरी कैंसर का खतरा कम हो सकता है

हार्मोनल परिवर्तनों के कारण स्तनपान कराने वाली महिलाओं में ओवरी कैंसर का जोखिम भी अपेक्षाकृत कम पाया गया है।

3. प्रसवोत्तर रिकवरी तेज होती है

स्तनपान के दौरान ऑक्सीटोसिन हार्मोन का स्राव बढ़ता है, जिससे

  • गर्भाशय सामान्य आकार में लौटने में मदद मिलती है।
  • प्रसव के बाद रक्तस्राव कम हो सकता है।
  • मां की शारीरिक रिकवरी बेहतर होती है।

4. मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव

स्तनपान के दौरान ऑक्सीटोसिन और प्रोलैक्टिन जैसे हार्मोन भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करते हैं। इससे कई महिलाओं में तनाव कम होने और प्रसवोत्तर अनुकूलन में सहायता मिल सकती है। हालांकि यदि किसी महिला को प्रसवोत्तर अवसाद (Postpartum Depression) के लक्षण हों, तो चिकित्सकीय सहायता लेना आवश्यक है।

भारत के किन राज्यों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज हुई?

NFHS-6 के प्रारंभिक विश्लेषण के अनुसार कई बड़े राज्यों में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग के आंकड़ों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।

राज्यNFHS-5NFHS-6
उत्तर प्रदेशलगभग 59.7%34.6%
हरियाणा69.5%41.2%
दिल्लीलगभग 64%54%
राजस्थान70.4%54.3%
मध्य प्रदेशलगभग 74%56.4%

दूसरी ओर कुछ राज्यों ने सुधार भी दर्ज किया

  • केरल
  • गुजरात
  • पश्चिम बंगाल

इन राज्यों में बेहतर सामुदायिक जागरूकता, मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों की प्रभावी निगरानी और स्वास्थ्य कर्मियों की सक्रिय भूमिका को संभावित कारण माना जा रहा है। हालांकि प्रत्येक राज्य के लिए विस्तृत कारण अलग-अलग हो सकते हैं और उन पर आगे और अध्ययन की आवश्यकता है।

ग्रामीण और शहरी भारत की तस्वीर

पहले माना जाता था कि शहरों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर होने के कारण स्तनपान की स्थिति भी बेहतर होगी।

लेकिन अब तस्वीर अधिक जटिल है।

शहरी क्षेत्रों में

  • कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ी है।
  • जल्दी नौकरी पर लौटने का दबाव है।
  • फॉर्मूला मिल्क आसानी से उपलब्ध है।
  • न्यूक्लियर परिवार अधिक हैं।

वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में

  • पारंपरिक मान्यताएं,
  • शहद, घुट्टी या पानी जल्दी पिलाने जैसी प्रथाएं,
  • तथा पर्याप्त परामर्श की कमी

अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं।

इसका परिणाम यह है कि दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग कारणों से एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग प्रभावित हो रही है।

क्या अस्पतालों में बढ़ते प्रसव के बावजूद यह गिरावट एक विरोधाभास है?

यही NFHS-6 की सबसे बड़ी सीख है।

जब

  • अस्पतालों में प्रसव बढ़ रहे हैं,
  • डॉक्टरों की पहुंच बढ़ रही है,
  • ASHA और ANM कार्यकर्ता गांव-गांव पहुंच रहे हैं,
  • डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हो रही हैं,

तो फिर एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग क्यों घट रही है?

यही प्रश्न अब स्वास्थ्य नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

इसका उत्तर केवल जागरूकता में नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, कार्यस्थल, पारिवारिक और स्वास्थ्य व्यवस्था के संयुक्त विश्लेषण में छिपा है।

गिरावट के वास्तविक कारण, सामाजिक–आर्थिक विश्लेषण और वैश्विक तुलना)

“यदि अस्पताल बढ़ रहे हैं, डॉक्टर बढ़ रहे हैं, सरकारी योजनाएं बढ़ रही हैं और जागरूकता भी पहले से कहीं अधिक है, तो फिर एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग क्यों घट रही है?”
यही प्रश्न आज भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र के सामने सबसे बड़ी पहेली बन चुका है।

NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता की नहीं है। इसके पीछे आर्थिक दबाव, बदलती सामाजिक संरचना, कार्यस्थल की चुनौतियां, मातृत्व अवकाश की सीमाएं, सी-सेक्शन प्रसव, शिशु आहार उद्योग का बढ़ता प्रभाव और परामर्श की कमी जैसे अनेक कारण एक साथ काम कर रहे हैं।

कारण-1 : आर्थिक दबाव और जल्दी काम पर लौटने की मजबूरी

भारत में लाखों महिलाएं ऐसी हैं जो बच्चे के जन्म के कुछ ही सप्ताह बाद काम पर लौटने को मजबूर हो जाती हैं। यह केवल करियर का प्रश्न नहीं, बल्कि परिवार की आय और रोज़मर्रा के खर्चों से जुड़ा मुद्दा है।

यदि मां पूरे दिन घर पर नहीं रह सकती, तो परिवार अक्सर बच्चे को फॉर्मूला मिल्क, बोतल का दूध या अन्य पूरक आहार देना शुरू कर देता है। धीरे-धीरे यह आदत एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग को समाप्त कर देती है।

WHO का मानना है कि कार्यस्थल पर उचित समर्थन न मिलना स्तनपान छोड़ने के प्रमुख कारणों में से एक है।

भारत की 90 प्रतिशत महिला कार्यबल असंगठित क्षेत्र में

भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि महिलाओं का विशाल हिस्सा असंगठित (Informal) क्षेत्र में कार्यरत है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी और श्रम संबंधी विभिन्न सरकारी आकलनों के अनुसार, भारत के कुल रोजगार का लगभग 85–90 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र में आता है। महिलाओं की बड़ी संख्या भी इसी क्षेत्र में कार्य करती है।

इनमें शामिल हैं

  • खेतिहर मजदूर
  • घरेलू कामगार
  • निर्माण मजदूर
  • स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं
  • छोटी दुकानों में काम करने वाली महिलाएं
  • सिलाई-कढ़ाई एवं घरेलू उत्पादन कार्य
  • रेहड़ी-पटरी व्यवसाय
  • गिग एवं प्लेटफ़ॉर्म आधारित कार्य (कुछ मामलों में)

इन महिलाओं को अक्सर निम्न सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं

  • वेतन सहित मातृत्व अवकाश
  • नौकरी की सुरक्षा
  • स्तनपान के लिए निर्धारित समय
  • क्रेच सुविधा
  • लैक्टेशन रूम
  • स्वास्थ्य बीमा
  • सामाजिक सुरक्षा

यही कारण है कि आर्थिक मजबूरी कई परिवारों को समय से पहले वैकल्पिक शिशु आहार अपनाने की ओर धकेल देती है।

कारण-2 : मातृत्व अवकाश का लाभ सभी महिलाओं तक नहीं पहुंचता

भारत में Maternity Benefit (Amendment) Act, 2017 के तहत औपचारिक (Formal) क्षेत्र की पात्र महिलाओं को अधिकतम 26 सप्ताह (लगभग 6 महीने) का सवैतनिक मातृत्व अवकाश प्रदान किया जाता है।

यह कानून विश्व के अपेक्षाकृत बेहतर मातृत्व अवकाश प्रावधानों में गिना जाता है।

लेकिन वास्तविकता यह है कि इसका लाभ मुख्यतः उन्हीं महिलाओं को मिलता है जो

  • संगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं,
  • कानून के दायरे में आने वाले प्रतिष्ठानों में काम करती हैं,
  • और जिनका रोजगार औपचारिक रूप से पंजीकृत है।

दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र की करोड़ों महिलाओं को यह सुविधा या तो नहीं मिलती या बहुत सीमित रूप में उपलब्ध होती है। परिणामस्वरूप उन्हें प्रसव के तुरंत बाद काम पर लौटना पड़ता है।

कारण-3 : कार्यस्थलों पर क्रेच और लैक्टेशन रूम की कमी

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मातृत्व अवकाश पर्याप्त नहीं है। यदि महिला नौकरी पर लौटती है, तो कार्यस्थल पर शिशु देखभाल की सुविधाएं भी आवश्यक हैं।

एक आदर्श कार्यस्थल पर होना चाहिए

  • सुरक्षित क्रेच
  • स्तनपान या दूध निकालने (Expressing Milk) के लिए निजी कक्ष (Lactation Room)
  • दूध सुरक्षित रखने की व्यवस्था
  • लचीला कार्य समय (Flexible Working Hours)
  • Work From Home का विकल्प (जहां संभव हो)

भारत के कई बड़े कॉर्पोरेट कार्यालयों, हवाई अड्डों और कुछ सरकारी संस्थानों में ऐसी सुविधाएं विकसित की गई हैं, लेकिन अधिकांश छोटे प्रतिष्ठानों और असंगठित कार्यस्थलों पर इनका अभाव है।

कारण-4 : सी–सेक्शन (Cesarean) प्रसव में लगातार वृद्धि

NFHS-6 के अनुसार भारत में सिजेरियन (C-section) प्रसव का प्रतिशत बढ़ा है।

  • NFHS-5: लगभग 21.5%
  • NFHS-6: लगभग 27%

यानी लगभग हर चार में से एक प्रसव अब सर्जरी के माध्यम से हो रहा है। यह वृद्धि कई कारणों से हुई है उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाएं, चिकित्सा आवश्यकताएं, निजी अस्पतालों में अधिक सिजेरियन दर और मातृ आयु में बदलाव आदि।

हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सी–सेक्शन स्वयं स्तनपान का विरोधी नहीं है। यदि मां और शिशु की स्थिति स्थिर हो, तो ऑपरेशन के बाद भी शीघ्र स्तनपान शुरू कराया जा सकता है। लेकिन व्यवहारिक रूप से कई मामलों में

  • मां को अधिक दर्द होता है,
  • रिकवरी में समय लगता है,
  • नवजात को कुछ समय अलग रखना पड़ सकता है,
  • शुरुआती स्तनपान में देरी हो जाती है।

यही देरी कई बार फॉर्मूला मिल्क की शुरुआत का कारण बन जाती है।

कारण-5 : सही स्तनपान परामर्श (Breastfeeding Counselling) का अभाव

अधिकांश पहली बार मां बनने वाली महिलाओं के मन में अनेक प्रश्न होते हैं

  • बच्चा कितनी बार दूध पिए?
  • यदि बच्चा बार-बार रोता है तो क्या वह भूखा है?
  • दूध कम बन रहा है तो क्या करें?
  • सही पकड़ (Latch) क्या होती है?
  • स्तन में दर्द हो तो क्या करना चाहिए?
  • रात में कितनी बार स्तनपान कराना चाहिए?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर अस्पताल में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा समय पर न दिया जाए, तो कई परिवार जल्दी ही फॉर्मूला मिल्क की ओर बढ़ जाते हैं।

WHO और UNICEF दोनों मानते हैं कि जन्म के तुरंत बाद की स्तनपान काउंसलिंग एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग बढ़ाने का सबसे प्रभावी उपायों में से एक है।

कारण-6 : संयुक्त परिवारों का टूटना

भारत का पारिवारिक ढांचा भी तेजी से बदला है।

पहले

  • दादी,
  • नानी,
  • बुआ,
  • बड़ी बहन,
  • परिवार की अन्य अनुभवी महिलाएं

नई मां की सहायता करती थीं।

आज शहरी भारत में न्यूक्लियर परिवार तेजी से बढ़े हैं।

ऐसी स्थिति में

  • पति नौकरी पर,
  • पत्नी पहली बार मां बनी,
  • घर में कोई अनुभवी सदस्य नहीं,

तो कई बार छोटी-छोटी समस्याएं भी बड़ी बन जाती हैं और स्तनपान जल्दी छूट जाता है।

कारण-7 : सोशल मीडिया और अधूरी जानकारी

डिजिटल युग में जानकारी तेजी से फैलती है, लेकिन हर जानकारी सही नहीं होती।

आज नई माताओं को सोशल मीडिया पर तरह-तरह की सलाह मिलती है

  • “बच्चा रो रहा है, दूध कम है।”
  • “फॉर्मूला मिल्क ज्यादा पौष्टिक है।”
  • “गाय का दूध जल्दी शुरू कर दो।”
  • “शहद चटाना जरूरी है।”

इनमें से कई सलाह वैज्ञानिक रूप से गलत हैं।

सही जानकारी का स्रोत केवल

  • प्रशिक्षित डॉक्टर,
  • बाल रोग विशेषज्ञ,
  • स्त्री रोग विशेषज्ञ,
  • ASHA,
  • ANM,
  • या प्रमाणिक सरकारी एवं अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाएं

होनी चाहिए।

कारण-8 : फॉर्मूला मिल्क की बढ़ती उपलब्धता

भारत सहित दुनिया भर में शिशु आहार (Infant Formula) का बाजार लगातार बढ़ रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिन परिस्थितियों में मां का दूध उपलब्ध नहीं है या चिकित्सकीय कारणों से स्तनपान संभव नहीं है, वहां फॉर्मूला मिल्क एक महत्वपूर्ण विकल्प हो सकता है।

लेकिन WHO स्पष्ट करता है

फॉर्मूला मिल्क एक विकल्प (Alternative) हो सकता है, लेकिन मां के दूध का विकल्प (Replacement) नहीं।

कई बार परिवार सुविधा, विज्ञापन या गलत धारणाओं के कारण भी अनावश्यक रूप से फॉर्मूला मिल्क शुरू कर देते हैं।

क्या Human Milk Bank समाधान बन सकते हैं?

ऐसे नवजात जिनकी मां किसी चिकित्सकीय कारण से तुरंत स्तनपान नहीं करा सकतीं, उनके लिए Human Milk Bank एक महत्वपूर्ण विकल्प बन रहे हैं।

इन बैंकों में

  • स्वस्थ स्तनपान कराने वाली माताएं स्वेच्छा से दूध दान करती हैं।
  • दूध की जांच, पाश्चराइजेशन और सुरक्षित भंडारण किया जाता है।
  • आवश्यकता होने पर समयपूर्व (Preterm) या गंभीर रूप से बीमार नवजातों को उपलब्ध कराया जाता है।

भारत में जयपुर, मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे सहित कई शहरों में मानव दुग्ध बैंक संचालित हो रहे हैं। हालांकि उनकी संख्या अभी भी देश की आवश्यकता की तुलना में सीमित है।

दुनिया के दूसरे देशों से भारत क्या सीख सकता है?

विश्व स्तर पर एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की स्थिति भी एक समान नहीं है।

UNICEF और WHO के अनुसार वैश्विक औसत लगभग 48 प्रतिशत के आसपास है। इसका अर्थ है कि भारत का वर्तमान स्तर (55.8%) अभी भी वैश्विक औसत से ऊपर है, लेकिन भारत ने पहले जो प्रगति हासिल की थी, उसके मुकाबले यह गिरावट चिंताजनक है।

कुछ देशों ने उल्लेखनीय सुधार किया है, जिनकी प्रमुख विशेषताएं हैं

  • सामुदायिक स्तनपान सलाहकार (Breastfeeding Counsellors)
  • Baby-Friendly Hospital Initiative (BFHI)
  • लंबा मातृत्व अवकाश
  • पितृत्व अवकाश (Paternity Leave)
  • कार्यस्थल पर स्तनपान सहायता
  • फॉर्मूला मिल्क के विज्ञापनों पर कड़ा नियंत्रण
  • समुदाय आधारित स्वास्थ्य कार्यक्रम

भारत भी इन उपायों से सीख लेकर अपनी नीतियों को और प्रभावी बना सकता है।

सबसे बड़ा विरोधाभास (The Biggest Paradox)

NFHS-6 का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि

  • अस्पतालों में प्रसव बढ़े।
  • इंटरनेट पहुंच बढ़ी।
  • स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हुईं।
  • मातृ जांच बढ़ी।
  • सरकारी योजनाएं बढ़ीं।

लेकिन एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग घट गई।

इसका अर्थ है कि केवल स्वास्थ्य ढांचा मजबूत करना पर्याप्त नहीं है। व्यवहार परिवर्तन (Behaviour Change), परिवार का सहयोग, कार्यस्थल सुधार, वैज्ञानिक परामर्श और सामाजिक समर्थन—इन सभी को एक साथ मजबूत करना होगा।

“यदि भारत को कुपोषण, बाल मृत्यु दर और कमजोर शारीरिक विकास जैसी चुनौतियों से स्थायी रूप से लड़ना है, तो इसका सबसे प्रभावी और कम लागत वाला उपाय जन्म के पहले छह महीनों तक केवल स्तनपान सुनिश्चित करना होगा।“

भारत सरकार क्या कर रही है?

पिछले एक दशक में भारत सरकार ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधारने के लिए कई राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किए हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य केवल सुरक्षित प्रसव कराना नहीं, बल्कि गर्भावस्था से लेकर बच्चे के शुरुआती वर्षों तक पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

हालांकि NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि इन योजनाओं के बावजूद एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग में गिरावट आई है। इससे स्पष्ट है कि अब योजनाओं के क्रियान्वयन और व्यवहार परिवर्तन (Behaviour Change Communication) पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

1. प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY)

यह भारत सरकार की प्रमुख मातृत्व सहायता योजना है।

इसका उद्देश्य है

  • गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता देना।
  • प्रसव पूर्व जांच के लिए प्रोत्साहित करना।
  • मां और बच्चे के पोषण में सुधार करना।
  • प्रसव के बाद मां को पर्याप्त आराम और देखभाल के लिए सहयोग देना।

हाल के वर्षों में योजना का दायरा बढ़ाया गया है ताकि अधिक पात्र महिलाओं को लाभ मिल सके।

2. MAA (Mother’s Absolute Affection Programme)

यह कार्यक्रम विशेष रूप से स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया।

इसके प्रमुख उद्देश्य

  • जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराना।
  • छह महीने तक एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग को बढ़ावा देना।
  • अस्पतालों और समुदाय स्तर पर काउंसलिंग उपलब्ध कराना।
  • ASHA, ANM और स्टाफ नर्सों को विशेष प्रशिक्षण देना।

लेकिन NFHS-6 के परिणाम बताते हैं कि इस अभियान को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

3. ICDS (Integrated Child Development Services)

1975 में शुरू की गई ICDS दुनिया के सबसे बड़े बाल विकास कार्यक्रमों में से एक है।

यह योजना प्रदान करती है

  • पूरक पोषण
  • टीकाकरण
  • स्वास्थ्य जांच
  • प्री-स्कूल शिक्षा
  • पोषण परामर्श
  • गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सहायता

आंगनवाड़ी केंद्र इस योजना की रीढ़ माने जाते हैं।

4. पोषण अभियान (POSHAN Abhiyaan)

2018 में शुरू किए गए पोषण अभियान का उद्देश्य है

  • कुपोषण कम करना
  • बच्चों में ठिगनापन (Stunting) कम करना
  • एनीमिया घटाना
  • कम जन्म वजन वाले बच्चों की संख्या कम करना
  • पोषण संबंधी जन-जागरूकता बढ़ाना

यह अभियान तकनीक आधारित निगरानी, मोबाइल ऐप और सामुदायिक भागीदारी पर विशेष जोर देता है।

5. LaQshya Programme

LaQshya (Labour Room Quality Improvement Initiative) का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों के

  • लेबर रूम
  • ऑपरेशन थिएटर
  • प्रसव सेवाओं

की गुणवत्ता में सुधार करना है।

इस कार्यक्रम से संस्थागत प्रसव में सुधार हुआ है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अब इसमें स्तनपान काउंसलिंग को भी अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए।

6. SUMAN (Surakshit Matritva Aashwasan)

इस योजना के तहत

  • गर्भवती महिलाओं
  • नवजात शिशुओं
  • प्रसूता महिलाओं

को सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में निःशुल्क एवं सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

Baby-Friendly Hospital Initiative (BFHI) से भारत क्या सीख सकता है?

WHO और UNICEF द्वारा शुरू किया गया Baby-Friendly Hospital Initiative (BFHI) दुनिया के सबसे सफल कार्यक्रमों में से एक माना जाता है।

इस पहल के तहत अस्पतालों को 10 प्रमुख मानकों का पालन करना होता है, जिनमें प्रमुख हैं

  • जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू कराना।
  • मां और बच्चे को अलग न करना (Rooming-in)।
  • बिना चिकित्सकीय आवश्यकता फॉर्मूला मिल्क न देना।
  • अस्पताल से छुट्टी के बाद भी स्तनपान सहायता उपलब्ध कराना।
  • सभी स्वास्थ्यकर्मियों को स्तनपान संबंधी प्रशिक्षण देना।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत में अधिक सरकारी और निजी अस्पताल BFHI मानकों को अपनाएं, तो एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की दर में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

WHO और UNICEF की प्रमुख सिफारिशें

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और UNICEF निम्नलिखित सलाह देते हैं

✔ जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करें।

✔ पहले छह महीने केवल मां का दूध दें।

✔ छह महीने बाद पौष्टिक पूरक आहार शुरू करें।

✔ दो वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखें।

✔ बिना चिकित्सकीय सलाह फॉर्मूला मिल्क शुरू न करें।

✔ बीमार बच्चे को भी अधिकांश स्थितियों में स्तनपान जारी रखें (डॉक्टर की सलाह के अनुसार)।

✔ परिवार के सभी सदस्यों को स्तनपान का समर्थन करना चाहिए।

भारत को आगे क्या करना चाहिए?

NFHS-6 के आंकड़ों के आधार पर विशेषज्ञ निम्न सुधारों की आवश्यकता बताते हैं।

1. हर अस्पताल में Lactation Counsellor अनिवार्य हों

जैसे प्रत्येक अस्पताल में प्रसूति विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ होते हैं, उसी प्रकार प्रशिक्षित स्तनपान सलाहकार भी उपलब्ध होने चाहिए।

2. डिस्चार्ज से पहले अनिवार्य स्तनपान प्रशिक्षण

अस्पताल से छुट्टी मिलने से पहले प्रत्येक मां को सिखाया जाए

  • सही पकड़ (Correct Latch)
  • दूध पिलाने की सही स्थिति
  • दूध कम बनने की स्थिति में क्या करें
  • कितनी बार स्तनपान कराना चाहिए

3. ASHA और ANM की भूमिका और मजबूत हो

प्रसव के बाद पहले 42 दिनों में नियमित घर-घर जाकर फॉलो-अप किया जाए।

4. डिजिटल स्वास्थ्य अभियान शुरू हों

आज भारत में करोड़ों महिलाएं स्मार्टफोन का उपयोग करती हैं।

सरकार निम्न सुविधाएं विकसित कर सकती है

  • WhatsApp चैटबॉट
  • AI आधारित मातृत्व सलाह
  • वीडियो काउंसलिंग
  • स्थानीय भाषाओं में एनिमेटेड वीडियो
  • SMS रिमाइंडर
  • मोबाइल ऐप आधारित स्तनपान मार्गदर्शन

5. कार्यस्थलों पर सुधार

सरकार और निजी क्षेत्र को

  • क्रेच
  • Lactation Room
  • Flexible Working Hours
  • Work From Home
  • Breastfeeding Break

जैसी सुविधाओं का विस्तार करना चाहिए।

6. असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के लिए विशेष सहायता

भारत की सबसे बड़ी चुनौती यही है।

यदि लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं असंगठित क्षेत्र में हैं, तो केवल संगठित क्षेत्र के कानून पर्याप्त नहीं होंगे।

विशेष योजनाएं आवश्यक हैं

  • मातृत्व सहायता
  • पोषण सहायता
  • मोबाइल स्वास्थ्य सेवाएं
  • सामुदायिक स्तनपान केंद्र

7. Human Milk Banks का विस्तार

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि प्रत्येक बड़े मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में मानव दुग्ध बैंक स्थापित किए जाएं।

इससे

  • समयपूर्व जन्मे बच्चे
  • कम वजन वाले नवजात
  • गंभीर रूप से बीमार शिशु

को बेहतर पोषण मिल सकेगा।

समाज और परिवार की क्या जिम्मेदारी है?

केवल सरकार प्रयास करे, यह पर्याप्त नहीं होगा।

परिवार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

परिवार क्या कर सकता है?

  • मां को पर्याप्त आराम दे।
  • घरेलू कार्यों का बोझ कम करे।
  • स्तनपान के दौरान मानसिक सहयोग दे।
  • बिना डॉक्टर की सलाह वैकल्पिक दूध शुरू न करे।
  • गलत पारंपरिक मान्यताओं से बचे।
  • पिता (Father) भी सक्रिय रूप से शिशु देखभाल में भाग लें।

अनुसंधान बताते हैं कि जहां पिता और परिवार का सहयोग अधिक होता है, वहां स्तनपान की अवधि भी अधिक होती है।

क्या भारत 2030 तक स्थिति सुधार सकता है?

भारत के पास मजबूत स्वास्थ्य नेटवर्क मौजूद है

  • लगभग 13 लाख से अधिक ASHA कार्यकर्ता
  • लगभग 14 लाख से अधिक आंगनवाड़ी केंद्र
  • हजारों सरकारी अस्पताल
  • आयुष्मान भारत हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर
  • डिजिटल हेल्थ मिशन
  • ई-संजीवनी टेलीमेडिसिन प्लेटफ़ॉर्म

यदि इन सभी संसाधनों को स्तनपान जागरूकता से प्रभावी ढंग से जोड़ा जाए, तो आने वाले वर्षों में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की दर में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

विशेषज्ञों की अंतिम राय

बाल रोग विशेषज्ञों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि

“एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग किसी एक मां की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र, परिवार, कार्यस्थल और समाज की साझा जिम्मेदारी है।“

जब तक महिलाओं को पर्याप्त समय, सम्मान, वैज्ञानिक सलाह और सामाजिक सहयोग नहीं मिलेगा, तब तक केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त साबित नहीं होंगे।

भारत के लिए यह केवल स्वास्थ्य नहीं, भविष्य का निवेश है

NFHS-6 ने भारत के सामने एक स्पष्ट संदेश रखा है। एक ओर संस्थागत प्रसव, गर्भावस्था जांच और स्वास्थ्य सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, वहीं दूसरी ओर जीवन के पहले छह महीनों तक केवल मां का दूध देने की दर में गिरावट दर्ज हुई है। यह विरोधाभास बताता है कि स्वास्थ्य व्यवस्था केवल अस्पतालों और योजनाओं तक सीमित नहीं रह सकती; उसे परिवार, समाज और कार्यस्थल तक पहुंचना होगा।

स्तनपान किसी महंगे उपकरण, दवा या तकनीक पर निर्भर नहीं है। यह प्रकृति द्वारा दिया गया सबसे सुरक्षित, सबसे सुलभ और सबसे किफायती पोषण है। यदि भारत एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की दर को फिर से बढ़ाने में सफल होता है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव केवल कुपोषण या संक्रमण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बच्चों के संज्ञानात्मक विकास, शिक्षा, उत्पादकता और देश की मानव पूंजी (Human Capital) पर भी दिखाई देगा।

भारत ने पहले भी इस क्षेत्र में प्रगति की है। इसलिए NFHS-6 की चेतावनी को एक अवसर के रूप में लेकर सरकार, स्वास्थ्यकर्मियों, अस्पतालों, परिवारों और समुदायों को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां हर मां बिना सामाजिक, आर्थिक या कार्यस्थलीय बाधाओं के अपने बच्चे को जीवन के पहले छह महीने केवल अपना दूध पिला सके। यही स्वस्थ, सक्षम और आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव होगी।

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग कितने समय तक करनी चाहिए?

WHO और UNICEF के अनुसार जन्म से पहले 6 महीने तक केवल मां का दूध देना चाहिए।

2. क्या पहले छह महीने पानी भी दिया जा सकता है?

नहीं। सामान्य परिस्थितियों में मां के दूध में मौजूद पानी बच्चे की आवश्यकता पूरी कर देता है।

3. छह महीने बाद क्या करना चाहिए?

पौष्टिक पूरक आहार शुरू करें और 2 वर्ष या उससे अधिक समय तक स्तनपान जारी रखें।

4. यदि मां का दूध कम बने तो क्या करें?

स्वयं निर्णय न लें। स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ या प्रशिक्षित लैक्टेशन काउंसलर से सलाह लें।

5. क्या फॉर्मूला मिल्क मां के दूध का विकल्प है?

नहीं। यह केवल विशेष परिस्थितियों में चिकित्सकीय सलाह पर उपयोग किया जाने वाला विकल्प (Alternative) है, मां के दूध का पूर्ण प्रतिस्थापन (Replacement) नहीं।

प्रामाणिक स्रोत (Authentic Sources)

  1. World Health Organization (WHO) – Infant and Young Child Feeding Guidelines
  2. WHO – Exclusive Breastfeeding Indicators
  3. UNICEF – Breastfeeding Data & Global Database
  4. UNICEF India – Infant and Young Child Feeding
  5. Ministry of Health & Family Welfare (MoHFW), Government of India
  6. National Family Health Survey (NFHS-6), IIPS Mumbai
  7. International Institute for Population Sciences (IIPS)
  8. National Health Mission (NHM)
  9. POSHAN Abhiyaan
  10. Integrated Child Development Services (ICDS)
  11. Prime Minister Matru Vandana Yojana (PMMVY)
  12. MAA (Mother’s Absolute Affection Programme)
  13. LaQshya Programme Guidelines
  14. Surakshit Matritva Aashwasan (SUMAN)
  15. Indian Academy of Pediatrics (IAP) – Breastfeeding Guidelines
  16. The Lancet Breastfeeding Series
  17. UN Sustainable Development Goals – Nutrition
  18. National Medical Commission (NMC)
  19. WHO & UNICEF – Baby-Friendly Hospital Initiative (BFHI)
  20. National Digital Health Mission (NDHM)


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