भारत की आवश्यक दवाओं की सूची वैश्विक मानकों से क्यों पीछे छूटी

भारत की आवश्यक दवाओं की सूची वैश्विक मानकों से क्यों पीछे छूटी


क्या सस्ती और जीवनरक्षक दवाओं तक हर भारतीय की पहुंच सुनिश्चित है?

भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा उत्पादक देशों में से एक है। देश लगभग 200 से अधिक देशों को दवाओं का निर्यात करता है और “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” (Pharmacy of the World) के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। लेकिन इसी भारत में एक ऐसा महत्वपूर्ण सवाल उठ रहा है जो करोड़ों मरीजों के इलाज, स्वास्थ्य बजट और जीवन से जुड़ा हुआ है- क्या भारत की National List of Essential Medicines (NLEM) समय के साथ चल रही है, या वह वैश्विक स्वास्थ्य मानकों से पीछे छूट चुकी है?

हाल के वर्षों में स्वास्थ्य विशेषज्ञों, मरीज अधिकार संगठनों और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति से जुड़े शोधकर्ताओं ने चिंता जताई है कि भारत की आवश्यक दवाओं की सूची (NLEM) का अंतिम संशोधन वर्ष 2022 में हुआ था, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) अपनी Model List of Essential Medicines को वर्ष 2023 और 2025 में दो बार अपडेट कर चुका है। परिणामस्वरूप भारत की सूची में कई नई, अधिक प्रभावी और जीवनरक्षक दवाएं अभी भी शामिल नहीं हैं।

यह केवल एक प्रशासनिक देरी नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर गरीब मरीजों, सरकारी अस्पतालों, स्वास्थ्य योजनाओं और दवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है।

NLEM क्या है और यह इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

National List of Essential Medicines (NLEM) भारत सरकार द्वारा तैयार की जाने वाली ऐसी राष्ट्रीय सूची है जिसमें उन दवाओं को शामिल किया जाता है जिन्हें देश की अधिकांश आबादी की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो यह उन दवाओं की सूची है जो

  • सबसे अधिक उपयोग में आती हैं।
  • गंभीर और सामान्य दोनों प्रकार की बीमारियों के इलाज में जरूरी हैं।
  • वैज्ञानिक रूप से प्रभावी (Effective) हैं।
  • सुरक्षित (Safe) हैं।
  • गुणवत्तापूर्ण (Quality Assured) हैं।
  • आम नागरिक की पहुंच में रहने योग्य कीमत पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

WHO के अनुसार किसी भी देश की Essential Medicines List का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हर नागरिक को जरूरत के समय उचित गुणवत्ता वाली आवश्यक दवाएं उचित मात्रा में और किफायती कीमत पर उपलब्ध हो सकें।

भारत में NLEM कैसे तैयार की जाती है?

भारत में यह सूची स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (Ministry of Health and Family Welfare) के अंतर्गत विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की जाती है।

किसी दवा को सूची में शामिल करने से पहले अनेक वैज्ञानिक पहलुओं का मूल्यांकन किया जाता है

बीमारी का बोझ (Disease Burden)

देश में कौन-सी बीमारी सबसे अधिक लोगों को प्रभावित कर रही है?

उदाहरण

  • मधुमेह
  • उच्च रक्तचाप
  • कैंसर
  • टीबी
  • मलेरिया
  • निमोनिया
  • हृदय रोग

दवा की प्रभावशीलता (Efficacy)

क्या दवा वास्तव में मरीज पर अपेक्षित प्रभाव डालती है?

क्या उसके परिणाम वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हैं?

सुरक्षा (Safety)

क्या दवा के दुष्प्रभाव सीमित हैं?

क्या उसका लाभ उसके जोखिम से कहीं अधिक है?

गुणवत्ता (Quality)

क्या दवा मानकीकृत गुणवत्ता के साथ बनाई जा रही है?

क्या उसका उत्पादन GMP (Good Manufacturing Practices) के अनुसार हो रहा है?

लागत–प्रभावशीलता (Cost Effectiveness)

यदि दो दवाएं समान रूप से प्रभावी हैं तो कम कीमत वाली दवा को प्राथमिकता दी जाती है ताकि अधिक से अधिक लोग उसका लाभ उठा सकें।

NLEM में दवा शामिल होने का मरीजों को क्या लाभ मिलता है?

बहुत से लोगों को लगता है कि NLEM केवल एक सूची है, लेकिन वास्तव में इसका प्रभाव पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर पड़ता है।

यदि कोई दवा NLEM में शामिल हो जाती है तो उसके कई बड़े फायदे होते हैं।

1. दवा की कीमत नियंत्रित की जा सकती है

भारत में National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) आवश्यक दवाओं के अधिकतम मूल्य (Ceiling Price) निर्धारित करती है।

इसके बाद दवा निर्माता कंपनियां उस सीमा से अधिक कीमत नहीं ले सकतीं।

इसका सबसे बड़ा लाभ मरीजों को मिलता है।

2. सरकारी अस्पतालों में उपलब्धता बढ़ती है

सरकारी अस्पतालों द्वारा सबसे अधिक खरीदी जाने वाली दवाओं में NLEM की दवाओं को प्राथमिकता दी जाती है।

इससे सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत होती हैं।

3. गरीब मरीजों का इलाज आसान होता है

यदि किसी जीवनरक्षक दवा की कीमत नियंत्रित हो जाती है तो गरीब मरीज भी उसे खरीद सकते हैं।

यही NLEM का सबसे बड़ा उद्देश्य है।

4. सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को मजबूती मिलती है

भारत में कई राष्ट्रीय कार्यक्रम NLEM की दवाओं पर आधारित हैं

  • राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम
  • राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम
  • मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम
  • मधुमेह नियंत्रण कार्यक्रम
  • मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम

NPPA क्या है और इसकी भूमिका क्या होती है?

अक्सर लोग NLEM और NPPA को एक ही समझ लेते हैं।

वास्तव में दोनों की भूमिका अलग-अलग है।

NLEM

बताती है कि कौन-सी दवा देश के लिए आवश्यक है।

NPPA

उन दवाओं की अधिकतम कीमत तय करती है।

NPPA वर्ष 1997 में स्थापित की गई थी और यह Drug Price Control Order (DPCO) के तहत कार्य करती है।

वर्तमान में NLEM में शामिल अधिकांश अनुसूचित (Scheduled) दवाओं पर NPPA मूल्य सीमा निर्धारित कर सकती है।

इसका उद्देश्य है

  • मरीजों को उचित कीमत पर दवा उपलब्ध कराना।
  • कंपनियों द्वारा अत्यधिक मूल्य वसूली रोकना।
  • स्वास्थ्य सेवाओं की लागत कम करना।

भारत की वर्तमान NLEM में कितनी दवाएं हैं?

भारत सरकार ने सितंबर 2022 में NLEM का नवीनतम संस्करण जारी किया था।

इस सूची में

  • कुल 384 आवश्यक दवाएं
  • लगभग 34 नई दवाएं जोड़ी गईं
  • 26 दवाएं हटाई गईं
  • सूची को 27 प्रमुख चिकित्सीय श्रेणियों में विभाजित किया गया

इन श्रेणियों में शामिल हैं

  • हृदय रोग
  • कैंसर
  • मधुमेह
  • संक्रमण
  • मानसिक स्वास्थ्य
  • प्रसूति
  • बाल चिकित्सा
  • नेत्र रोग
  • त्वचा रोग
  • टीबी
  • एचआईवी
  • टीके (Vaccines)

भारत सरकार के अनुसार NLEM 2022 तैयार करते समय रोग भार, वैज्ञानिक प्रमाण और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं को ध्यान में रखा गया था।

WHO की Essential Medicines List क्या है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पहली बार 1977 में Essential Medicines List जारी की थी।

तब इसमें केवल 208 दवाएं थीं।

आज यह संख्या बढ़कर 523 दवाओं तक पहुंच चुकी है (WHO Model List 2025)।

WHO प्रत्येक दो वर्ष में दुनिया भर के विशेषज्ञों की समिति के माध्यम से इस सूची की समीक्षा करता है।

यदि कोई नई दवा

  • अधिक प्रभावी हो,
  • अधिक सुरक्षित हो,
  • बेहतर वैज्ञानिक प्रमाण रखती हो,

तो उसे सूची में जोड़ा जा सकता है।

इसी कारण WHO की सूची लगातार बदलती रहती है।

भारत और WHO की सूची में कितना अंतर है?

यहीं से वर्तमान विवाद शुरू होता है।

मापदंडWHO Model List (2025)भारत NLEM (2022)
कुल दवाएं523384
अंतिम संशोधन20252022
संशोधन अंतरालप्रत्येक 2 वर्ष4 वर्ष से अधिक
नई वैज्ञानिक दवाओं का समावेशनियमितअपेक्षाकृत धीमा

इसका अर्थ यह नहीं है कि WHO की सभी 523 दवाएं भारत में अनिवार्य रूप से शामिल होनी चाहिए। WHO स्वयं स्पष्ट करता है कि प्रत्येक देश अपनी स्वास्थ्य आवश्यकताओं, रोग भार और संसाधनों के अनुसार सूची में संशोधन कर सकता है।

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में कई ऐसी आधुनिक और जीवनरक्षक दवाएं अब भी सूची से बाहर हैं, जिन्हें शामिल करने पर मरीजों को कम कीमत पर बेहतर उपचार मिल सकता है।

क्या WHO की सूची भारत पर कानूनी रूप से लागू होती है?

यह एक Model List है, बाध्यकारी कानून नहीं।

WHO देशों को वैज्ञानिक दिशा-निर्देश देता है, लेकिन प्रत्येक देश अपनी स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुसार दवाओं का चयन कर सकता है।

हालांकि, WHO की सूची को वैश्विक स्वास्थ्य नीति का मानक (Global Benchmark) माना जाता है। इसलिए अधिकांश देश समय-समय पर अपनी राष्ट्रीय सूची को WHO की सिफारिशों के अनुरूप अपडेट करते रहते हैं।

चार साल की देरी क्यों बनी चिंता का विषय?

भारत की National List of Essential Medicines (NLEM) का अंतिम संशोधित संस्करण सितंबर 2022 में जारी हुआ था। दूसरी ओर, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसी अवधि में अपनी Model List of Essential Medicines को 2023 और 2025 में दो बार अपडेट किया। इसका मतलब यह है कि चिकित्सा विज्ञान में हुए नए शोध, आधुनिक उपचारों और नई प्रभावी दवाओं का समावेश WHO की सूची में लगातार होता रहा, जबकि भारत की सूची अपेक्षाकृत स्थिर बनी रही।

यहीं से विशेषज्ञों की चिंता शुरू होती है। उनका कहना है कि चिकित्सा विज्ञान आज बहुत तेजी से बदल रहा है। हर वर्ष नई दवाएं, नई जैविक (Biological) थेरेपी, नई कैंसर-रोधी दवाएं और नई एंटीबायोटिक्स विकसित हो रही हैं। यदि आवश्यक दवाओं की सूची समय पर अपडेट नहीं होगी, तो मरीज आधुनिक उपचारों के लाभ से वंचित रह सकते हैं।

हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि WHO की हर दवा भारत के लिए आवश्यक नहीं होती। भारत अपनी रोग-स्थिति, स्वास्थ्य बजट, उपलब्ध संसाधनों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर सूची तैयार करता है। लेकिन जब किसी दवा के पक्ष में पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हों और वह लाखों मरीजों के इलाज में उपयोगी हो, तब उसका समय पर मूल्यांकन और आवश्यकता अनुसार समावेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

किन नई दवाओं को लेकर सबसे अधिक बहस हो रही है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मरीज अधिकार संगठनों द्वारा जिन दवाओं के बारे में सबसे अधिक चर्चा की जा रही है, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं

नई कैंसररोधी दवाएं (New Oncology Medicines)

कैंसर उपचार में पिछले एक दशक में सबसे बड़ा बदलाव Targeted Therapy और Immunotherapy के रूप में आया है।

कई नई दवाएं केवल कैंसर कोशिकाओं पर हमला करती हैं, जिससे स्वस्थ कोशिकाओं को अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुंचता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी अनेक आधुनिक दवाएं अभी भारत की NLEM में शामिल नहीं हैं।

मधुमेह की आधुनिक दवाएं

भारत को अक्सर “विश्व की मधुमेह राजधानी“ कहा जाता है।

International Diabetes Federation (IDF) Diabetes Atlas 2025 के अनुसार

  • भारत में लगभग 10 करोड़ से अधिक वयस्क (20–79 वर्ष) मधुमेह से प्रभावित हैं।
  • करोड़ों लोग प्री-डायबिटीज (Prediabetes) की अवस्था में हैं।
  • भारत दुनिया में मधुमेह रोगियों की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल है।

पिछले कुछ वर्षों में मधुमेह उपचार के लिए कई नई दवाएं विकसित हुई हैं जो केवल रक्त शर्करा नियंत्रित नहीं करतीं बल्कि

  • हृदय रोग का खतरा कम करती हैं।
  • किडनी की सुरक्षा करती हैं।
  • वजन घटाने में भी सहायता करती हैं।

इनमें SGLT2 inhibitors तथा GLP-1 receptor agonists जैसी दवाओं पर विशेष चर्चा होती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन आधुनिक उपचारों का समय-समय पर वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है।

नई पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स

दुनिया आज Antimicrobial Resistance (AMR) यानी एंटीबायोटिक प्रतिरोध की गंभीर समस्या से जूझ रही है।

WHO के अनुसार यदि एंटीबायोटिक प्रतिरोध इसी गति से बढ़ता रहा, तो भविष्य में सामान्य संक्रमणों का इलाज भी कठिन हो सकता है।

ऐसे में नई पीढ़ी की प्रभावी एंटीबायोटिक्स का समय पर मूल्यांकन और आवश्यकता अनुसार सूची में शामिल होना महत्वपूर्ण माना जाता है।

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी आखिर होती क्या हैं?

हाल के वर्षों में चिकित्सा विज्ञान में जिस तकनीक ने सबसे अधिक बदलाव लाया है, उनमें Monoclonal Antibodies (mAbs) प्रमुख हैं।

ये प्रयोगशाला (Laboratory) में तैयार किए गए विशेष प्रकार के प्रोटीन होते हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) की सहायता करते हैं।

इनका कार्य किसी विशेष वायरस, बैक्टीरिया, सूजन पैदा करने वाले अणु या कैंसर कोशिका को पहचानकर उस पर लक्षित (Targeted) हमला करना होता है।

इन्हें “स्मार्ट मेडिसिन” भी कहा जाता है क्योंकि ये पारंपरिक दवाओं की तुलना में अधिक सटीक तरीके से कार्य करती हैं।

किन रोगों में उपयोग होती हैं मोनोक्लोनल एंटीबॉडी?

इनका उपयोग अनेक गंभीर रोगों में किया जाता है

  • विभिन्न प्रकार के कैंसर
  • रूमेटॉयड आर्थराइटिस
  • सोरायसिस
  • क्रोहन रोग
  • मल्टीपल स्क्लेरोसिस
  • कुछ रक्त संबंधी रोग
  • कुछ वायरल संक्रमण
  • ऑटोइम्यून बीमारियां

हालांकि इनकी कीमत सामान्य दवाओं की तुलना में कई गुना अधिक होती है।

इसी कारण यदि ऐसी दवाओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर आवश्यक होने पर NLEM में शामिल किया जाए और बाद में मूल्य नियंत्रण लागू हो सके, तो भविष्य में मरीजों का आर्थिक बोझ कम हो सकता है।

कैंसर के मरीजों के लिए यह मुद्दा इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत में कैंसर का बोझ लगातार बढ़ रहा है।

Indian Council of Medical Research (ICMR)-National Cancer Registry Programme (NCRP) के अनुसार

  • भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग 15–16 लाख नए कैंसर रोगी सामने आते हैं।
  • आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ने का अनुमान है।

कैंसर के उपचार में आज

  • Targeted Therapy
  • Immunotherapy
  • Precision Medicine

का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।

लेकिन इन उपचारों की लागत कई बार लाखों रुपये तक पहुंच जाती है।

यदि इनमें से कुछ दवाएं आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल होती हैं और बाद में मूल्य नियंत्रण के दायरे में आती हैं, तो उपचार अधिक किफायती हो सकता है।

क्या केवल कैंसर ही चिंता का विषय है?

भारत में तेजी से बढ़ रहे कई गैर-संचारी रोग (Non-Communicable Diseases) भी इसी बहस का हिस्सा हैं।

इनमें शामिल हैं

  • मधुमेह
  • उच्च रक्तचाप
  • हृदय रोग
  • किडनी रोग
  • स्ट्रोक
  • मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारियां

WHO के अनुसार भारत में होने वाली कुल मौतों में लगभग दो–तिहाई से अधिक (लगभग 66%) गैर-संचारी रोगों के कारण होती हैं।

इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि NLEM का समय-समय पर अद्यतन होना इन रोगों के बेहतर प्रबंधन के लिए भी आवश्यक है।

देरी का सबसे बड़ा नुकसान आखिर किसे होता है?

1. गरीब मरीज

यदि कोई नई दवा NLEM में शामिल नहीं होती, तो उस पर मूल्य नियंत्रण लागू नहीं हो पाता।

ऐसी स्थिति में उसका बाजार मूल्य बहुत अधिक रह सकता है।

गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए ऐसी दवाएं खरीदना लगभग असंभव हो जाता है।

2. सरकारी अस्पताल

सरकारी अस्पतालों की खरीद नीति में NLEM महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

यदि आधुनिक दवाएं सूची में नहीं हों, तो अस्पतालों में उनका नियमित उपयोग सीमित रह सकता है।

3. डॉक्टर

डॉक्टर कई बार नई और अधिक प्रभावी दवा उपलब्ध होने के बावजूद मरीज की आर्थिक स्थिति को देखते हुए पुरानी दवा लिखने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

4. स्वास्थ्य योजनाएं

सरकारी बीमा योजनाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की दवा खरीद भी NLEM से प्रभावित होती है।

इसलिए सूची का अद्यतन पूरे स्वास्थ्य तंत्र को प्रभावित करता है।

भारत में स्वास्थ्य खर्च की वास्तविक तस्वीर

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च अभी भी बड़ी सीमा तक लोगों को अपनी जेब से (Out-of-Pocket Expenditure) करना पड़ता है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (National Health Accounts) के हालिया अनुमानों के अनुसार, पिछले वर्षों में इसमें कमी आई है, फिर भी कुल स्वास्थ्य व्यय का एक बड़ा हिस्सा सीधे नागरिकों द्वारा वहन किया जाता है।

दवाएं इस व्यक्तिगत खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा होती हैं।

यानी यदि आवश्यक दवाएं सस्ती हों, तो लाखों परिवार आर्थिक संकट से बच सकते हैं।

क्या यह केवल स्वास्थ्य नीति का विषय है?

विशेषज्ञ इसे तीन बड़े दृष्टिकोणों से देखते हैं

सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health)

समय पर उपचार मिलने से मृत्यु दर कम हो सकती है।

सामाजिक समानता (Health Equity)

गरीब और अमीर दोनों को समान अवसर मिलते हैं।

आर्थिक सुरक्षा

कम कीमत वाली दवाएं परिवारों को गरीबी में धकेले जाने से बचा सकती हैं।

स्वास्थ्य सेवा का 3A सिद्धांत क्या है?

विशेषज्ञ अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं के 3A मॉडल की बात करते हैं।

Affordable

दवा इतनी सस्ती हो कि हर व्यक्ति खरीद सके।

Accessible

दवा गांव, शहर और सरकारी अस्पताल तक आसानी से पहुंच सके।

Available

जरूरत पड़ने पर दवा वास्तव में उपलब्ध भी हो।

यदि इन तीनों में से किसी एक की भी कमी हो जाए, तो स्वास्थ्य प्रणाली कमजोर पड़ जाती है।

क्या NLEM केवल दवाओं की सूची है?

यह भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का एक ऐसा आधारभूत दस्तावेज है, जो तय करता है कि देश किन दवाओं को प्राथमिकता देगा, किनकी कीमत नियंत्रित होगी और किन उपचारों को आम जनता तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।

इसी कारण विशेषज्ञ मानते हैं कि NLEM का नियमित, पारदर्शी और वैज्ञानिक आधार पर संशोधन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों के स्वास्थ्य अधिकार से जुड़ा विषय है।

क्या केवल WHO की पूरी सूची अपनाना ही समाधान है?

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या भारत को WHO की Model List of Essential Medicines में शामिल सभी 523 दवाओं को बिना किसी बदलाव के अपनी National List of Essential Medicines (NLEM) में शामिल कर लेना चाहिए?

स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञों के अनुसार WHO की सूची एक “मॉडल सूची” (Model List) है, न कि कानूनी रूप से लागू होने वाला कोई वैश्विक नियम। इसका उद्देश्य देशों को वैज्ञानिक दिशा-निर्देश देना है। प्रत्येक देश अपनी जनसंख्या, रोग-भार (Disease Burden), स्वास्थ्य अवसंरचना, आर्थिक क्षमता और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार सूची को संशोधित कर सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी बीमारी का प्रकोप किसी देश में बहुत कम है, तो उस बीमारी की सभी दवाओं को राष्ट्रीय सूची में शामिल करना आवश्यक नहीं होगा। वहीं, जिस देश में मधुमेह, टीबी, उच्च रक्तचाप, कैंसर या हृदय रोग अधिक हैं, वहां इन रोगों से जुड़ी दवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।

इसलिए विशेषज्ञों की मांग यह नहीं है कि WHO की पूरी सूची को ज्यों का त्यों अपनाया जाए, बल्कि यह है कि भारत समय–समय पर वैज्ञानिक साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए अपनी सूची को अद्यतन करे और जिन नई दवाओं की वास्तविक आवश्यकता है, उन्हें शीघ्र शामिल करे।

NLEM को अपडेट करने में देरी क्यों होती है?

यह प्रश्न कई वर्षों से सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय रहा है। सरकार ने आधिकारिक रूप से किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया है, लेकिन स्वास्थ्य नीति से जुड़े विशेषज्ञ कई संभावित कारण बताते हैं।

1. वैज्ञानिक मूल्यांकन की जटिल प्रक्रिया

किसी भी दवा को NLEM में शामिल करने से पहले केवल उसकी प्रभावशीलता ही नहीं देखी जाती, बल्कि यह भी परखा जाता है कि

  • क्या वह भारतीय मरीजों के लिए उपयुक्त है?
  • क्या उसके पर्याप्त क्लिनिकल परीक्षण उपलब्ध हैं?
  • क्या उसके दुष्प्रभाव स्वीकार्य हैं?
  • क्या उसका दीर्घकालिक उपयोग सुरक्षित है?
  • क्या वह लागत के हिसाब से लाभदायक (Cost-effective) है?

इन सभी पहलुओं का मूल्यांकन समय लेता है।

2. विशेषज्ञ समितियों की समीक्षा

NLEM का संशोधन विभिन्न चिकित्सा विशेषज्ञों, फार्माकोलॉजिस्ट, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की समितियों द्वारा किया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों से सुझाव लेने, वैज्ञानिक साहित्य की समीक्षा करने और सहमति बनाने में भी समय लगता है।

3. दवाओं की कीमतों पर प्रभाव

NLEM में किसी दवा के शामिल होने के बाद उस पर National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) द्वारा मूल्य नियंत्रण लागू किया जा सकता है।

इसका सीधा प्रभाव दवा उद्योग पर पड़ता है। इसलिए किसी नई दवा को सूची में शामिल करने का निर्णय आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है।

हितों के टकराव (Conflict of Interest) पर क्यों उठते हैं सवाल?

कई सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि NLEM तैयार करने वाली समितियों की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए।

विशेषज्ञों की मुख्य चिंताएँ हैं

  • समिति के सदस्यों के हितों की सार्वजनिक घोषणा (Disclosure)
  • यदि किसी सदस्य का किसी दवा कंपनी से व्यावसायिक संबंध हो, तो वह संबंधित दवा पर निर्णय प्रक्रिया से अलग रहे
  • चयन के वैज्ञानिक आधार को सार्वजनिक किया जाए
  • किन दवाओं को शामिल किया गया और किन्हें नहीं, इसके कारण स्पष्ट रूप से बताए जाएँ

यह ध्यान देना आवश्यक है कि ऐसे सुझाव पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से दिए जाते हैं। किसी विशेष समिति या सदस्य पर बिना प्रमाण आरोप लगाना उचित नहीं होगा।

क्या नई दवा हमेशा बेहतर होती है?

यह एक आम धारणा है कि नई दवा हमेशा पुरानी दवा से बेहतर होती है, लेकिन चिकित्सा विज्ञान में ऐसा हमेशा सही नहीं होता।

कई बार

  • पुरानी दवा अधिक सुरक्षित होती है।
  • उसके दीर्घकालिक प्रभाव अच्छी तरह ज्ञात होते हैं।
  • वह कम कीमत में समान लाभ देती है।

इसीलिए WHO और भारत दोनों ही केवल “नई” होने के आधार पर किसी दवा को सूची में शामिल नहीं करते। निर्णय हमेशा वैज्ञानिक प्रमाण (Evidence-Based Medicine) पर आधारित होता है।

भारत के सामने सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियाँ कौन–सी हैं?

भारत की स्वास्थ्य आवश्यकताएँ लगातार बदल रही हैं। आज देश दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है

1. संक्रामक रोग (Communicable Diseases)

इनमें प्रमुख हैं

  • क्षय रोग (टीबी)
  • मलेरिया
  • डेंगू
  • वायरल संक्रमण
  • एचआईवी

भारत आज भी विश्व में टीबी के सबसे अधिक मामलों वाले देशों में शामिल है। इसलिए टीबी की आवश्यक दवाओं का समय पर उपलब्ध होना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

2. गैर–संचारी रोग (Non-Communicable Diseases)

पिछले दो दशकों में भारत में इन रोगों का बोझ तेजी से बढ़ा है।

इनमें शामिल हैं

  • कैंसर
  • मधुमेह
  • उच्च रक्तचाप
  • हृदय रोग
  • स्ट्रोक
  • किडनी रोग
  • मानसिक स्वास्थ्य संबंधी रोग

इन बीमारियों के उपचार में लगातार नई दवाएं विकसित हो रही हैं। इसलिए NLEM को भी बदलती स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुसार विकसित करना आवश्यक माना जाता है।

NLEM और आयुष्मान भारत का क्या संबंध है?

भारत सरकार की आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।

यदि आवश्यक दवाएं

  • कम कीमत पर उपलब्ध हों,
  • सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त मात्रा में मिलें,
  • और समय-समय पर आधुनिक उपचारों को सूची में शामिल किया जाए,

तो ऐसी योजनाओं की प्रभावशीलता भी बढ़ सकती है।

हालांकि PM-JAY केवल NLEM पर आधारित नहीं है, लेकिन आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

विशेषज्ञ क्या सुझाव दे रहे हैं?

स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ, सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान और मरीज अधिकार समूह कई सुधारों की मांग कर रहे हैं।

1. हर दो वर्ष में नियमित समीक्षा

WHO की तरह NLEM की भी निश्चित समय-सीमा पर समीक्षा की जाए।

2. वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित निर्णय

हर दवा का मूल्यांकन नवीनतम शोध, क्लिनिकल परीक्षण और भारतीय रोग-भार के आधार पर किया जाए।

3. पारदर्शी प्रक्रिया

  • सार्वजनिक सुझाव आमंत्रित किए जाएँ।
  • चयन के कारण प्रकाशित किए जाएँ।
  • समीक्षा रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए।

4. हितों के टकराव से मुक्त समिति

निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जाए।

5. रोग–भार आधारित प्राथमिकता

भारत में तेजी से बढ़ रहे

  • कैंसर
  • मधुमेह
  • हृदय रोग
  • मानसिक स्वास्थ्य
  • एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस

जैसी चुनौतियों को प्राथमिकता दी जाए।

भारत यदि समय पर NLEM अपडेट करे तो क्या लाभ होंगे?

यदि आवश्यक दवाओं की सूची नियमित रूप से अद्यतन होती है, तो इसके अनेक सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं।

मरीजों के लिए

  • आधुनिक उपचार तक बेहतर पहुंच
  • कम कीमत पर जीवनरक्षक दवाएं
  • उपचार में समान अवसर

सरकार के लिए

  • दवा खरीद में बेहतर योजना
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की मजबूती
  • संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग

स्वास्थ्य प्रणाली के लिए

  • वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित उपचार
  • बेहतर गुणवत्ता वाली दवाओं का उपयोग
  • स्वास्थ्य असमानता में कमी

क्या भारत वास्तव में पीछे है?

यदि केवल दवाओं की संख्या देखें, तो WHO की 2025 मॉडल सूची में 523 दवाएं हैं, जबकि भारत की NLEM 2022 में 384 दवाएं शामिल हैं। यह अंतर अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि भारत की सूची “गलत” या “अपूर्ण” है, क्योंकि दोनों सूचियों का उद्देश्य और संदर्भ अलग हैं।

लेकिन जहाँ चिंता उचित मानी जाती है, वह है समय पर समीक्षा का अभाव। चिकित्सा विज्ञान तेजी से बदल रहा है, नई दवाएं विकसित हो रही हैं और रोगों का स्वरूप भी बदल रहा है। ऐसे में यदि राष्ट्रीय सूची लंबे समय तक अपरिवर्तित रहती है, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि कुछ महत्वपूर्ण उपचार समय पर मूल्यांकन से बाहर रह जाएँ।

भारत को WHO की सूची की नकल करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्यों, राष्ट्रीय स्वास्थ्य आवश्यकताओं और सार्वजनिक हित के आधार पर नियमित, पारदर्शी और समयबद्ध समीक्षा करना भविष्य की स्वास्थ्य नीति के लिए अधिक उपयुक्त होगा।

समयरेखा (Timeline)

वर्षप्रमुख घटना
1977WHO ने पहली Essential Medicines List जारी की (208 दवाएँ)।
1997भारत में National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) की स्थापना।
2022भारत ने NLEM 2022 जारी की; कुल 384 दवाएँ शामिल, 34 नई जोड़ी गईं और 26 हटाई गईं।
2023WHO ने Essential Medicines Model List का अद्यतन संस्करण जारी किया।
2025WHO ने पुनः सूची अपडेट की; कुल लगभग 523 दवाएँ शामिल।
2026विभिन्न विशेषज्ञों और मरीज समूहों ने भारत में NLEM के शीघ्र संशोधन की आवश्यकता पर जोर दिया।

सूचनिका 365 इनसाइट्स

भारत आज वैश्विक दवा उत्पादन में अग्रणी देशों में से एक है, लेकिन केवल दवाओं का निर्माण पर्याप्त नहीं है। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि देश के प्रत्येक नागरिक तक सुरक्षित, प्रभावी और किफायती दवाएं समय पर पहुँचें। National List of Essential Medicines (NLEM) इसी लक्ष्य की आधारशिला है।

इसलिए आवश्यकता केवल सूची की लंबाई बढ़ाने की नहीं, बल्कि उसे वैज्ञानिक, पारदर्शी, रोग-भार आधारित और समयानुकूल बनाए रखने की है। यदि भारत नियमित समीक्षा, नवीनतम शोध और राष्ट्रीय आवश्यकताओं के संतुलन के साथ NLEM को अद्यतन करता है, तो इससे करोड़ों मरीजों, सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली और देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति तीनों को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।

लेख के स्रोत (Sources Used)

  • WHO Model List of Essential Medicines (2025)
  • Ministry of Health & Family Welfare, Government of India
  • National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA)
  • Drug Price Control Order (DPCO)
  • Press Information Bureau (PIB)
  • ICMR – National Cancer Registry Programme
  • International Diabetes Federation (IDF) Diabetes Atlas
  • WHO Global Health Observatory
  • हालिया सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मरीज समूहों की उपलब्ध रिपोर्टें एवं विश्लेषण (2025–2026)

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